आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की जैसे बाढ़ ही आ गयी है

खबरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है। किसी ज़माने में मुनादी के जरिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे। लोकगीतों के जरिये भी हुकुमत के फैसलों की खबरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं। वक्त के साथ- साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीकों में भी बदलाव आया। पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अखबार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं। पत्रकारिता का मकसद जनमानस को न सिर्फ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भा हा पत्रकारिता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। जिस तरह सृष्टि के दो पक्ष हैं, उसी तरह जिन्दगी के भी दो पहलू हैं, एक अच्छा है, तो दूसरा बुरा है। और ये दूसरा पहलू ही इंसान का बुराइ का तरफ ले जाता है, जुम की तरफ ले जाता है। अपराध दो तरह का होता है, एक अनजाने में हुआ अपराध और दूसरा जानबूझ कर साजिश के तहत अंजाम दिया गया अपराध। अनजाने में हुए अपराध में हादसे वगैरह शामिल होते हैं, जबकि जानबूझ कर किए जाने वाल अपराध में कल, बलात्कार, चोरी, डकैती, जालसाजी वगैरह आते हैं. इनकी फेहरिस्त बहुत लम्बी है। दरअसल, जब से दुनिया शुरू हुई है। और इंसान वजूद में आया, तभी से अपराध का भी जन्म हो गया। दुनिया के किसी भी देश के किसी भी सभ्यता के इतिहास में झांक कर देखें, वहां और चीजों के साथ अपराध भी जरूर नज़र आएगा। ये अपराध ही तो है, जिसकी वजह से न जाने कितने वंश, कितनी सभ्यताओं का खात्मा हुआ। खैर, अपराधों के बारे में जनमानस को बताना ही अपराध पत्रकारिता है। 'अपराध पत्रकारिता' कहने में ये शब्द जरूर अजीब लगते हैं, लेकिन जैसे खेल पत्रकारिता है, ठीक वैसे ही अपराध पत्रकारिता है। इसी अपराध पत्रकारिता की वजह से न जाने कितने दिल दहला देने वाले आपराधिक मामले सामने आए हैं। अखबारा के पन्ने जुम का काला दुनिया से आने वाली खौफनाक खुबरों से रंगे रहते हैं। कई ऐसी पत्रिकाए भी प्रकाशित हो रहा है, जिनमें सत्य घटनाओं पर आधारित । अपराध कथाएं शाया की जाती हैं। कई अखबार भी आपराधिक घटनाओं पर पूरा पृष्ठ या परिशिष्ट भी प्रकाशित करत हा पत्र-पत्रिकाओं में लोग आपराधिक घटनाओं के बारे में सिर्फ पढ़ पात ह, लाकन खुबारया चैनलों पर इनका नाट्य रूपांतरण पेश किया जाता है। खबरिया व अन्य। मनोरंजक टीवी चैनलों पर भी आपराधिक घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई हुई है। ये कार्यक्रम आपराधिक घटनाओं का विवेचना करते हैं। हर एपिसोड में नई घटनाओं को लेकर एक नई अपराध कथा होती है। इनमें तथ्यों की गहन । जांच-पड़ताल की जाती है। साथ ही इस बात का खूयाल रखा जाता है कि दर्शक घटना को भली-भांति समझ सके। सावधान इंडिया, क्राइम पेट्रोल, क्राइम अलर्ट जैसे कार्यक्रमों में दिल दहला देने वाली अपराध कथाओं को पेश किया जाता है। इन कार्यक्रमों की । खास बात ये है कि जनमानस को हमेशा सावधान और सरक्षित रहने की सीख भी देते हैं। इन कार्यक्रमों से यह भी पता चलता कि किस गलती की वजह से किस लापरवाही की वजह से कोई जर्म होता है। वे कौन- से कारण होते हैं, जिनकी वजह से लोग आपराधिक तत्वों का शिकार हो । जाते हैं, या खुद अपराध के दलदल में उतर जाते हैं। किस तरह कोई अच्छा-भला इंसान वहशी दरिन्दा बन जाता है, किस तरह कोई खुशहाल घर-परिवार बर्बाद हो जाता है। किस तरह जिन्दगी को चाहने वाला, ज़िन्दगी से मुहब्बत करने वाला । इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है या हमेशा के लिए मौत की आगोश में सो जाता है। किस तरह जिन्दगी देने वाले हाथ मौत का सौदा करने लगते हैं। अपराध पत्रकारिता से ही इंसान के उस वहशी रूप का पता चलता है कि किस तरह वह कब्र में मौत की नींद सो रही महिला तक को ही महिला तक को जमीन खोद कर बाहर निकाल लेता और फिर उसे अपनी हवस का शिकार बना डालता है। किस तरह मासूम बच्चियों पर कहर ढहाया जाता है, किस तरह धोखे से या जबरन मानव शरीर से अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं, किस तरह दहेज के लिए दुल्हनों को जिन्दा आग के हवाले कर दिया जाता है, किस तरह इंसानों खासकर महिलाओं और बच्चों की ज़िन्दगी का सौदा किया जाता है, उन्हें खरीदा-बेचा जाता है। किस तरह रिश्तों की मान- मर्यादाओं को तार-तार करके अपनी ही बहन-बेटियों का शारीरिक शोषण किया जाता है। इनमें ये भी दिखाया जाता है कि किस तरह कोई अनजान व्यक्ति जरा सा अपनापन दिखाकर पहले विश्वास जीत लेता है और फिर एक बड़े खौफनाक जर्म को अंजाम जर्म को अंजाम देता है। ये एक तल्क हकीकत है कि आपराधिक घटनाओं में शामिल ज्यादातर लोग करीबी रिश्तेदार और ज्यादातर लोग करीबी रिश्तेदार और । जान-पहचान वाले लोग ही होते हैं। इन कार्यक्रमों में सिर्फ अपराध के बारे में ही नहीं दिखाया जाता, बल्कि इसमें ये भी दिखाया जाता है कि । मसीबत में फंसे व्यक्ति किस तरह खद को बचाने की कोशिश करते हैं। वे किस तरह संघर्ष करते हुए इंसाफ की लड़ाई लड़ते हैं और इंसाफ़ हासिल करते हैं। काबिले-गौर है कि अपराध की जो खबरें मीडिया में आती हैं, जिन पर फैसले आते हैं। उन घटनाओं को नाम और पते बदलकर उन पर कार्यक्रम बनाया जाता है। इनमें नाम पते भले ही बदल दिए जाते हों, लेकिन पीड़ित लोगों की तकलीफ़ को, उनके दर्द को, उनके संघर्ष को दिखाने की परी कोशिश की जाती है, ताकि उन्हें । इंसाफ मिल सके। इन कार्यक्रमों में विभिन्न आपराधिक मुद्दों पर परिचर्चा भी होती है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है। पत्रपत्रिकाओं में जहां पृष्ठ सीमित रहते हैं, वहीं दिन रात यानी चौबीसों घंटे चलने वाले खबरिया व अन्य मनोरंजक टीवी चैनलों में जगह की कोई कमी नहीं। पिछले काफी अरसे से टीवी चैनलों पर आपराधिक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रमों का खूब प्रसारण हो रहा है। इनके दर्शकों की तादाद भी लाखों में है, जो दिनोंदिन बढ़ रही है। इनके लोकप्रिय होने का एक वजह ये भी है कि । किसी मुंबईया फिल्म की तरह इसमें भी वह सब मसाले रहते हैं, जो देशका को बाध रखते हैं। इनमें रहस्य भी है, रोमांच भी है और आगे क्या होगा, ये जान शामिल रहती है। इन कार्यक्रमों के जरिये जनमानस को सतर्क रहने की ज़ार सीख दी जाती हैं। इसका असर भी देखने को मिल रहा है। अब लोग पहल स जागरूक हो रह हा व अपन आसपास भी नज़र रखने लगे हैं। जाप पहले जहां लोग जरा-सी पूछताछ करने के बाद ही नौकर या किरायेदार रख लिया करते थे, वहा अब इस मामले में खासी सावधानी बरतते नज़र आने लगे हैं। ये एक अच्छा १९ पहलू है। हकीकत तो यही है कि जिन्दगी में जो कुछ घटता है, वह अच्छा हो या बुरा, हम कोई न कोई सबक जरूर देता है. इसी तरह जुर्म का य कथाए भी हमशा सजग आर साफ सतर्क रहने की सीख देती हैं।