बहुत खास है इस बार करवा चैथ

भारत में त्योहारों का सीजन शुरू हो गया है। नवरात्रि और दशहरा के बाद करवा चैथ आता है। करवा चैथ शब्द दो शब्दों से मिलाकर बना है। करवा यानी मिट्टी का बर्तन और चैथ यानि चतुर्थी। इस पूजा में मिट्टी के बर्तन यानी करवे का विशेष महत्व होता है। करवा चैथ उत्तर भारत का एक प्रमुख त्योहार है जो पति की लंबी उम्र के लिये कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। महिलाओं का सबसे खास पर्व इस साल शनिवार 27 अक्टूबर को है। कार्तिक के महीने में आने वाले त्योहारों में सबसे पहला त्योहार करवा चैथ का ही है। एक दिन का यह त्योहार प्रत्येक वर्ष मुख्यतः उत्तरी भारत की विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। चैथ का व्रत कछ अविवाहित लड़कियों द्वारा भी रखा जाता है अपने मंगेतर की लंबी उम्र के लिए। इस बार का करवा चैथ कुछ खास मायनों में पहले के करवा चैथों से अलग और खास है और इसे खास बनाने की वजह है इस बार अमृत |सिद्धि और सर्वार्थ सिद्धि योग है। विद्वानों के अनसार यह योग 27 साल बाद बन रहा है। दुर्लभ योग इस बार के करवा चैथ के व्रत और त्योहार को बेहद खास बनाएगा। व्रत रखने के लिए यह उपयुक्त दिन है। करवा चैथ पर अमृत सिद्धि और सर्वार्थ सिद्धि का विशेष संयोग अब 16 साल बाद आएगा। इससे पहले यह संयोग 1991 में बना था। यह पर्व सुहागिन स्त्रियाँ मनाती हैं। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं और रात को चांद देखकर उसे अर्घय देकर व्रत खोलती हैं। इस व्रत की शुरुआत सावित्री के त्याग और फल से हुई थी। पौराणिक कथा के अनुसार सावित्री अन्न जल त्याग कर यमराज से अपने पति को वापस लाई थी। यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 4 बजे के बाद शुरू होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होता है। यह व्रत अच्छे गहस्थ जीवन के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। स्त्री किसी भी बुलुस योग इस बार के खास बनाएगा इव आयु, जाति, वर्ण, संप्रदाय की हो, सबको इस व्रत को करने का अधिकार है। इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं। सोलह श्रृंगार में माथे पर लंबी सिंदर अवश्य हो क्योंकि यह पति की लंबी उम्र का प्रतीक है। मंगलसूत्र, मांग टीका, बिंदिया काजल, नथनी, कर्णफल, मेहंदी, कंगन, लाल रंग की चुनरी, बिछिया, पायल, कमरबंद, अंगूठी, बाजूबंद और गजरा ये 16 श्रृंगार में आते हैं। इस दिन सुहागिन स्त्रियां निर्जल व्रत कर चैथ माता से अपने पति की लम्बी उम्र की कामना करती है। इस व्रत को उत्तर भारत में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। व्रत में चैथ माता के पूजन का महत्व सर्वाधिक है। इस दिन महिलाएं सजी थाली से पूजा करना शुभ मानती हैं। करवा चैथ के व्रत में चैथ माता की पूजा करना जरूरी होता है। करवा चैथ व्रत कथा 12 बजकर 30 से लेकर शाम 4 बजे तक सन सकती हैं। करवा चैथ का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट तक है। इसके अलावा रात 8 बजे तक चंद्रोदय होने का अनमान लगाया जा रहा है। चंद्रयोदय के थाली में सिंदूर, रोली, जल और सूखे मेवे रखते हैं। करवा चैथ के व्रत और पूजा में इस थाली का खासा महत्व होता है। इसलिए कछ महिलाएं खुद भी ये थाली सजाती हैं। करवा चैथ पर भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा होती है। इस पजा में शाम को सभी व्रती महिलाएं एक साथ बैठकर व्रत कथा कहती हैं। सबसे पहले चैथ माता की स्थापित मूर्ती पर फूल माला और कलावा चढ़ाया जाता है और उनके प्रतिमा के आगे करवा में जल भर कर रखा जाता है। करवा चैथ के दिन चंद्रमा उदय होने का समय सभी महिलाओं के लिए बहुत महत्व का है क्योंकि वे अपने पति की । लम्बी उम्र के लिये पूरे दिन (बिना पानी के) व्रत रखती हैं। वे केवल उगते हुये पूरे चॉद को देखने के बाद ही पानी पीती हैं। यह माना जाता है कि चाँद देखे बिना व्रत अधुरा है। इस दिन महिला न कुछ खा सकती हैं और न पानी पी सकती हैं। इस दिन महिलाएं शिव, पावर्ती और कार्तिक की पूजा-अर्चना करती हैं फिर शाम को छलनी से चंद्रमा और पति को देखते हुए पूजा करती हैं। पूजा । के समय ही करवा चैथ की कथा सुनी जाती है. चन्द्रमा को छलनी से देखा जाना चाहिए। फिर अंत में पति के हाथों से जल पीकर व्रत समाप्त हो जाता है अंत में चांद का दीदार करने के बाद महिलाएं पति के हाथों पानी पीकर अपना व्रत तोड़ती हैं. यह माना जाता है कि अगर छलनी में चंद्रमा देखते हुए पति की शक्ल देखना शुभ माना जाता है।