बिहार में हमेशा उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली है राजग को

पटना। 22 साल के दौरान बीच के दो-तीन साल को छोड़ दें तो बिहार में जदयू-भाजपा का गठबंधन हमेशा ही कारगर रहा है। दोनों दलों का सामाजिक आधार गठबंधन को पूर्णता प्रदान करता है। जब-जब दोनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा, उन्हें उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली। यही वजह है कि मिशन 2019 के लिए सीटों के बंटवारे के वक्त दोनों दलों ने अन्य सहयोगी लोजपा और रालोसपा की परवाह तक नहीं की। इस गठबंधन की शुरुआत 1995 में हुई थी। 1995 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की समता पार्टी बुरी तरह से हार गई। तबतक भाजपा वैश्य और सवर्ण की पार्टी कही जाती थी। मंडल उभार से निकले नीतीश कुमार को गैर यादव पिछड़ों की राजनीति करनी थी। सवर्ण और वैश्य की पार्टी भाजपा से उन्होंने गठबंधन भी इसीलिए किया ताकि गैर यादव पिछड़ी जातियों को गोलबंद करके लालू यादव के मुस्लिमयादव (माय) की सशक्त गोलबंदी को चुनौती दे सके। यह प्रयोग पहली बार 1996 के लोकसभा चुनाव में हुआ। उस वक्त बिहार और झारखंड एक था। लोकसभा की 54 सीटें हुआ करती थी। इस गठबंधन ने पहले ही चुनाव में साझा प्रयास से बिहार की 23 लोकसभा सीटें जीत ली। भाजपा को 18 और समता पार्टी को पांच सीटें मिली। दो साल बाद 1998 में बालिका गृह कांडः फरार हुएलोकसभा चुनाव में तो नहीं लेकिन उसके एक साल बाद 1999 के लोससभा चुनावों में बिहार में भाजपा और जदयू के गठबंधन ने केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनाने में महत्वूपर्ण भूमिका निभाई। इस चुनाव में 20.77 फीसद वोट हासिल कर जदयू ने लोकसभा की 18 सीटें हासिल कर ली। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 1996 में । सामाजिक समीकरण के आधार पर भाजपा से गठबंधन की जो बुनियाद रखी, वह 2000 के विधानसभा चुनाव आते-आते परवान चढ़ी और सात दिनों के लिए ही सही नीतीश कुमार को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया। यह अलग बात है कि चारा घोटाले में अभियुक्त बना दिए जाने के बाद भी लालू के पति चंद्रशेखर वर्मा यादव ने जोड़तोड़ करके कांग्रेस की मदद से राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनवा दिया। चुनाव दर चुनाव मजबूत होते गया। साइनिंग इसके बाद भी दोनों दलों का यह गठबंधन इंडिया के कारण 2004 के लोकसभा चुनावों में गठबंधन को उम्मीद के अनुरूप सफलता नहीं मिली। जदयू को छह और भाजपा को पांच सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। लेकिन मार्च 2005 के विधानसभा चुनाव में यह गठबंधन एक बार फिर से मजबूती के साथ उभरा। केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार थी। लालू यादव रेलमंत्री थे। इसलिए विधानसभा चुनाव में हुई हार को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। केंद्र सरकार पर दबाव डालकर आधी रात को विधानसभा भंग करा दिया। इसके बाद नवंबर में विधानसभा के चुनाव हुए। इसमें नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए को भारी सफलता मिली। राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ। नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी। सुशासन के कार्यक्रम पर काम शुरू हुआ। चार साल बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में इसका साफ-साफ असर दिखा। जदयू ने लोकसभा की 20 और भाजपा ने 12 सीटों पर कब्जा। जमा लिया। लालू यादव के राजद को चार सीटों से संतोष करना पड़ा। 2010 के विधानसभा चुनाव में तो दोनों दलों के गठबंधन ने राजद को 22 सीटों पर समेट कर विरोधी दल की हैसियत से भी वंचित कर दिया।