गाजियाबाद की साहित्यिक पहचान बनाने में तत्कालीन जीडीए उपाध्यक्ष धर्मेंद्र देव की सोच रंग लाई : पं सरेश नीरव

एग्रीकलचई शहर को कल्चर्ड  नगर बनाने के लिए प्रशासनिक अधिकारी हमेशा रहते हैं तत्पर


 


गाजियाबाद। मध्यप्रदेश के ग्वालियर में 20 जून 1950 को जन्मे बिहार मूल के पंडित सुरेश नीव विज्ञान का विद्यार्थी होने के बावजूद छत्र जीवन से ही कविता से जुड़े हुए हैं। साहित्य का यह अनुराग इन्हें ग्वालियर से दिल्ली ले आया। तीन दशकों तक हिंदुस्तान टाइम्स की मासिक पत्रिका कादंबिनी के संपादक मंडल से संबद्ध रहे पंडित सुरेश नीरव जागरूक पत्रकार होने के साथसाथ एक प्रतिष्ठित कवि भी हैं। 26 से अधिक देशों में हिंदी का प्रतिनिधित्व कर चुके इस कवि के सृजनात्मक खाते में 7 टीवी सीरियल और 16 पुस्तकें दर्ज हैं। भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित श्री नीरव को प्रधानमंत्री द्वारा मीडिया इंटरनेशनल अवॉर्ड से भी नवाजा गया है। दक्षिण अफ्रीका में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में भारत सरकार के प्रतिनिधि मंडल में भी आपको बतौर कवि शामिल किया गया। हाल ही में आपको सुलभ साहित्य अकादमी द्वारा सुलभ श्रेष्ठ साहित्य साधना सम्मान से नवाजा गया है। आजकल आप देश की अग्रणी साहित्यिक संस्था सर्वर भाषा संस्कृति समन्वय समिति के राष्ट्रय अध्यक्ष हैं। जनप्रिय पाक्षिक प्रथम स्वर के ब्यूरो प्रमुख कमलेश पांडे ने उनके आवास गोविंदपुरम में उनसे गाजियाबाद में साहित्य की स्थिति-परिस्थिति के विषय में कुछ खास बातचीत की है। यहाँ प्रस्तुत है उसके कुछ प्रमुख अंश-


सवालः साहित्य और काव्य जगत में आपने क्या छाप छोड़ी है? रचना संसार में आप किन चीजों के लिए मशहर हैं। हमारे पाठकगण आपके श्रीमुख से जानना चाहेंगे ताकि आपका अनुकरण कर सकें।


जवाब : मेरी पहचान हिंदी और उर्द दोनों भाषाओं की सरहदी जमीन पर खड़े एक सफल और लोकप्रिय कवि सीएम योगी के रूप में है। काव्य पाठ के अलग अंदाज तथा प्रेम की गहराई और अध्यात्म की ऊंचाई के बीच सामाजिक समतल को सदैव एक सूत्र में पिरोने की अथक कोशिश करता रहता हूँ। साहित्य की शय्या और कविता की तरंग पर स्वच्छंद उच्चारण पर सहज अभ्यास है। वैदिक व्यंजना से आधनिक अभिव्यक्ति तक अपना अनुभूति विस्तार रखता हूँ। शब्द की व्यंजना शक्ति के व्यंग से लेकर आधुनिक जीवन की विडंबना के व्यंग (सटायर) तक शब्द सिद्धि का साधक हूं। मेरी लिखी 18 ग्रंथों के अलावा 325 पुस्तकों की भूमिका लिखने का सौभाग्य प्राप्त है। जिनमें उर्दू के अनेक ग्रंथों की भूमिका भी शामिल है। मुझे विचार में राम, व्यवह्मर में परशुराम की संज्ञा दी जाती है। ऐसे विरोधी स्वभाव को सौहार्दपूर्ण व्यवहार को साथ ले चलना कठिन कार्य है, फिर भी वीरता और स्वाभिमान को साथ लिए चलने की कोशिश करता हूँ। जो कठोर कर्तव्य और तरल भाव-प्रणव का आचरण सौंदर्य हैं। मैंने गजल दोहे और प्रगीत मुक्तक की रचना की है किंतु महाकाव्य नहीं लिखा। क्योंकि अब पाठकों के पास उसे पढ़ने का समय नहीं रहा।


सवालः गाजियाबाद की साहित्यिक उर्वरा-शक्ति कैसी है? इसकी स्वतंत्रताकालीन पृष्ठभूमि क्या है?


जवाबः गाजियाबाद और उसके आसपास का क्षेत्र साहित्यिक दृष्टिकोण से हमेशा ही उर्वर रहा है। यहां के कवियों ने शुरू से ही क्रांतिकारियों का मनोबल बढ़या है। पहले यह बहुत बड़ा जिला था जिसमें बागपत और गौतमबुद्ध नगर भी शामिल था। आज भी धौलाना और मोदीनगर इसके अजस्र ऊर्जा स्रोत हैं, क्योंकि यह क्रांतिकारियों की भूमि रही है। सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में धौलाना क्षेत्र और उसके आसपास के गांवों के क्रांतिकारियों को ब्रिटिश हुकूमत ने सामूहिक रूप से फांसी दे दी थी। क्योंकि मेरठ छवनी से बगावत करके जो लोग इधर आए थे, उनको आगे दिल्ली का रास्ता भी गाजियाबाद के लोगों ने ही दिया था। तब गाजियाबाद का शासक गाजीउद्दीन भी सेना लेकर दिल्ली कच कर गया था स्वतंत्रता सेनानियों के समर्थन में। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि यहां की भूमि बड़ी लखनऊ से पैदल ऊर्जावान भूमि है, जिसके लोग राशेयता से ओतप्रोत हैं।


सवाल : यहां के साहित्यिक मिजाज में क्या कमियां रही होंगी कि बाद में यह जिला गाजियाबाद के रूप में भी जाना गया?


जवाबः अगर किसी के पास ऊर्जा है। और उसका सही दिशा में, रचनात्मक दिशा में उपयोग नहीं हो पाता है तो वह ऊर्जा विध्वंशकारी ऊर्जा हो जाती है। नतीजा यह है कि जलं गाजियाबाद की देश भक्ति का इतिहास है वहीं गाजियाबाद का एक आपराधिक चेहरा भी है जहां गैंगवार अक्सर होते रहते हैं। शायद इसलिए जिला गाजियाबाद फिल्म भी बनी। अगर मैं कहूं तो गाजियाबाद एक एग्रीकल्चर्ड शहर है जिसे कल्चर्ड बनाना होगा। मेरा मतलब यह है कि गाजियाबाद, बनारस इलाहाबाद या लखनऊ नहीं है। यह अच्छी बात है कि गाजियाबाद में जो भी प्रशासनिक अधिकारी आते हैं, वह गाजियाबाद के चेहरे पर लगे आपराधिक दाग को ईमानदारी पूर्वक समाप्त करना चाहते हैं।


सवालः यहां की साहित्यिक गरिमा को फिर से बहाल करने के लिए कोई ऐसी यादगार पहल बताइये जिसका सकारात्मक असर हुआ हो।


जवाबः देखिए, जब गोविंदपुरम और अन्य इलाकों में जीए द्वारा कॉलोनी बसाई जा रही थी, तब जीडीए के तत्कालीन चेयरमैन धर्मेंद्र देव हिंदुस्तान टाइम्स समह के कार्यालय दिल्ली पहुंचे थे और यह पहल की थी कि कुछ बुद्धिजीवी लोग भी गाजियाबाद में मकान लें, ताकि गाजियाबाद का मूल चरित्र साहित्यिक हो जाए। तब उन्होंने 20-25 लोगों को फार्म भी दिए कि आपलोग इसे भर दीजिए। उनके आग्रह पर ही कादंबिनी के संपादक राजेंद्र अवस्थी से लेकर मैं सुरेश नीरव तथा अन्य कई प्रबुद्ध लोगों ने यहां अपना आवास बनाया। कहना न होगा कि आज गाजियाबाद बुद्धिजीवियों का एक बहुत बड़ा गढ़ बन गया है। वैशाली वसुंधरा इंदिरापुरम में अनेक हाई प्रोफाइल पत्रकार और कवि रहते हैं। और तो और, अरविंद केजरीवाल और मनीष शिशोदिया जैसे लोग भी इस गाजियाबाद के रास्ते से ही दिल्ली पहुंचे हैं।