गठबंधन की खुलती गांठे

गठबंधन की खुलती गांठे ढाई दशकों के लंबे इंतजार और कठिन समस्याओं व चुनौतियों से जूझते हुए बीते आम चुनाव में पहली बार देश को एक आत्मनिर्भर, मजबूत, निर्णायक और पूर्णबहुमत की सरकार मिली। हालांकि यह कहना गलत नहीं होगा कि पिछले चुनाव में भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिलना कई वजहों पर निर्भर था। मसलन कांग्रेस के प्रति भारी जनाक्रोश, मोदी के रूप में एक मजबूत विकल्प का अभ्युदय और कांग्रेस के क्षेत्रीय विरोधियों की एकजुटता और संप्रग के घटक दलों की आपसी फूट सरीखी तमाम ऐसी वजहें रहीं जिनका सम्मिलत असर भाजपा की अपने दम पर पूर्ण बहुमत के साथ जीत के तौर पर सामने आया। जाहिर तौर पर यह अकेले भाजपा की जीत कतई नहीं थी। इसमें महाराष्ट्र के पांच क्षेत्रीय व छोटे दलों का भी उतना ही योगदान था जितना बिहार में जदयू व रालोसपा सरीखे दलों का अथवा यूपी में अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का या फिर संयुक्त आंध्र प्रदेश में तेदेपा का। इन जैसे तमाम दलों ने उन सभी प्रदेशों में भाजपा को बढ़त दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जहां मुकाबला त्रिकोणीय अथवा बहुकोणीय था। लेकिन जिस अनुपात में ये क्षेत्रीय पार्टीयां भाजपा के लिये मददगार साबित हुई उस अनुपात में ना तो इन्हें श्रेय मिल पाया और ना ही सत्ता में हिस्सेदारी। सत्ता की मलाई में इन्हें हथउठाई से ही संतोष करना पड़ा। साथ ही राजू शेट्टी सरीखे जिन नेताओं को वह भी नहीं मिल सका उन्होंने राजग से अपनी राहें अलग कर लीं और तेदेपा सरीखी जिस पार्टी को पता चल गया कि भाजपा से अलग होकर लड़ने में ही भलाई है उसने भी राजग से किनारा कर लेना ही बेहतर समझा। बाद के दिनों में शिवसेना भी भाजपा की मनमानी से तंग आकर अलग लड़ने का ऐलान करने के लिये मजबूर हो गई और महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव उसने अपने दम पर ही लड़ा। लेकिन इन अंदरूनी उठापटक का भाजपा की सेहत पर अब तक इसलिये कोई फर्क नहीं पड़ा। क्योंकि लोकसभा में उसे अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा हासिल था और देश के 19 सूबों में उसकी ही सरकार थी जिसके दम पर राज्यसभा में भी उसकी स्थिति हर चुनाव के साथ मजबूत होती चली गई। लेकिन अब आगामी आम चुनावों की नजदीकियों को देखते हुए राजग के घटक दलों में असंतोष भी उभरने लगा है और उनकी महत्वाकांक्षाएं भी कुलाचे मारने लगी हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि भाजपा को अगर दोबारा सत्ता में आना है तो उसे इनको अपने साथ लेकर चलना ही होगा। लेकिन इन दलों के सामने ऐसी कोई विवशता नहीं है। सरकार भाजपा बनाये या कांग्रेस अथवा कोई अन्य मोर्चा। इनकी ख्वाहिश तो बस इतनी ही है कि जो भी सरकार बने वह मजबूर बने। तभी उसे मजबूती देने के एवज में इनकी दसों उंगलियां घी में होंगी और सिर कढ़ाही में। वर्ना अभी की तरह दया से हासिल खैरात पर ही निर्भर रहकर उन्हें पिछलग्गू बनकर चलना होगा और सरकार का जयकार करना होगा। खैर, अभी यह कहना। तो जल्दबाजी होगी कि आगामी सरकार मजबूत बनेगी या मजबूर। लेकिन दोनों ही सूरतों के लिये अपनी मजबूती सुनिश्चित करने के मकसद से तमाम क्षेत्रीय दलों ने अभी से अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी सिलसिले में जिस तरह से बसपा ने कांग्रेस की बांह मरोड़ी हुई है   इसी सिलसिले में जिस तरह से बसपा ने कांग्रेस की बांह मरोड़ी हुई है उसी प्रकार राजग के घटक दलों ने भी भाजपा की सींग पकड़ कर उसे नाच नचाना शुरू कर दिया है। इन दलों का साफ तौर पर कहना है कि वे गठबंधन में तभी शामिल होंगे जब उनकी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की जाएगी और सम्मानजनक संख्या में सीटें आवंटित की जाएंगी। यानि इन दलों का विकल्प खुला हुआ है कि जिधर अधिक मान-सम्मान मिलेगा और भविष्य सुनिश्चित दिखाई देगा उधर कूच करने में ये कतई देर नहीं लगाएंगे। इसके लिये दबाव बढ़ाने की शुरूआत जदयू ने की तो भाजपा ने उसे बिहार में अपने बराबर सीटें देने का वायदा करके उसे मना लिया। लेकिन जदयू से समझौता होने के बाद से रालोसपा और लोजपा फैल गए हैं। लोजपा ने ना सिर्फ अपनी जीती हुई तमाम सीटों पर दावा ठोंक दिया है बल्कि उसने अपने शीर्षतम नेता रामविलास पासवान के लिये भाजपा से राज्यसभा की सीट भी मांगी है। इसके अलावा कांग्रेस छोड़कर लोजपा में शामिल हुए मणिशंकर पांडेय के लिये पार्टी ने यूपी में भी हिस्सेदारी मांगी है। उधर रालोसपा ने भी साफ कर दिया है कि पिछली बार की तरह उसे बिहार की तीन लोकसभा सीटें नहीं दी गई तो वह गठबंधन से बाहर निकलने के विकल्पों पर भी विचार कर सकती है। भाजपा पर दबाव बढ़ाने के लिये रालोसपा ने मध्य प्रदेश की 66 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार भी उतार दिये हैं। बताया जाता है कि लोजपा और रालोसपा को लपकने के लिये राजद की अगुवाई वाला महागठबंधन भी जुगत बिठा रहा है और इन दोनों दलों को भाजपा द्वारा आवंटित की गई सीटों से अधिक सीटें देने का प्रलोभन भी दिया जा रहा है। दूसरी ओर यूपी में अपना दल हो या सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी। दोनों की ओर से भाजपा पर अधिकतम सीटों का पुरजोर दबाव है। इसी प्रकार शिवसेना भी भाजपा पर इस बात के लिये दबाव बनाए हुए है कि महाराष्ट्र में उसे अधिकतम सीटें आवंटित की जाएं और गुजरात, गोवा व मध्य प्रदेश में भी उसे हिस्सेदारी दी जाए। वर्ना आगामी चुनाव में अपनी खिचड़ी अलग पकाने का ऐलान तो पहले ही किया जा चुका है। ऐसी ही मांगें बाकी दलों की ओर से भी आगे की जा रही हैं और स्थिति यह है कि भाजपा के लिये राजग को पिछले चुनाव की शक्ल में बरकरार रख पाना भारी सिरदर्दी का सबब बनता जा रहा है। वैसे भी बिहार, पंजाब, दिल्ली और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों और यूपी के गोरखपुर व फूलपुर सरीखे गढ़ों के उपचुनावों ने यह तो बता ही दिया है कि ना तो मोदी की कोई राष्ट्रव्यापी लहर चलनेवाली है और ना ही भाजपा अपने दम पर अजेय हो सकती है। ऐसे में भाजपा की विवशता है सबको साथ लेकर चलने की क्योंकि जातिवादी राजनीति के माहौल में क्षेत्रीय ताकतों का वोटबैंक अपने साथ जोड़कर ही भाजपा दोबारा सत्ता में वापसी की कल्पना कर सकती है। वर्ना राजग का बिखराव और विरोधियों की एकता का नतीजा कितना। खतरनाक हो सकता है वह बिहार के विधानसभा चुनाव और यूपी के लोकसभा उपचुनावों ने पहले ही दर्शा और बता दिया है।