घर के भेदी को भेदने की जरूरत

 पाकिस्तान को भले ही इन दिनों आर्थिक मोर्चे पर भारी तंगी और कंगाली का सामना करना पड़ रहा हो और अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिये दुनिया भर में कटोरा लेकर भीख मांगने के लिये मजबूर होना पड़ रहा हो लेकिन जहां तक भारत के साथ रिश्तों का सवाल है तो इस मोर्चे पर वह कतई अपनी नीति और नीयत में तब्दीली लाने के लिये तैयार नहीं दिख रहा है। इसी का सबूत दिया है पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक बार फिर भारत के अंदरूनी मामलों को लेकर हल्की, सतही और गैर-जिम्मेदाराना बयान देकर। इमरान ने कहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता प्रक्रिया इसलिये शुरू नहीं हो पा रही है क्योंकि भारत में पाकिस्तान के रिश्ते को लेकर सियासत होती है। और आगामी चुनाव में यह एक बड़ा मुद्दा रहनेवाला है। इसी प्रकार की बात उन्होंने कश्मीर को लेकर कही है जहां उन्हें लगता है कि भारत की फौज और स्थानीय पुलिस द्वारा आम लोगों का उत्पीड़न किया जा रहा है। जाहिर तौर पर ऐसी बातें बेवकूफाना ही कही जाएंगी क्योंकि अव्वल तो उन्हें बेहत पता होना चाहिये कि भारत में अंदरूनी सियासत भले ही कितनी तीखी और कड़वी क्यों ना होती हो लेकिन बात जब पाकिस्तान की आती है तो यह सियासत का मुद्दा नहीं रह जाता। यह देश की आन, बान और शान का सवाल बन जाता है जिसको लेकिन किसी भी दल का नेता नेता, कार्यकर्ता या समर्थक कतई रत्ती भर भी समझौता नहीं कर सकता। रहा सवाल कश्मीर के अंदरूनी हालातों का तो पाकिस्तान को कश्मीर के उस हिस्से पर गौर करना चाहिये जिस पर उसने अवैध तरीके से कब्जा किया हुआ है और जहां से उठी आजादी की आवाज अब लंदन तक सुनाई पड़ रही है। भारत में हालात इस कदर बेहतर हो चले हैं कि जिन इलाकों में दहशतगर्दो का तूफान देखा जाता था वहां भी भाजपा सरीखी कट्टर राष्ट्रवादी पार्टी के प्रत्याशी आम लोगों के समर्थन से चुनाव जीत रहे हैं। यानि विश्व बिरादरी को बरगलाने के लिये इमरान द्वारा की जा रही बेतुकी बातों का कोई मतलब नहीं निकाला जा सकता। वर्ना अगर वे वार्ता शुरू करने के लिये वाकई इच्छुक होते तो सबसे पहले सीमापार से आतंकियों की खेप भेजने पर पाबंदी लगवाते और सरहद पर शांति का माहौल कायम कराते। लेकिन जिस तरह से पिछले दिनों सुंदरबनी इलाके से पाकिस्तानी फौज ने कवर फायर देकर आतंकियों को सरहद पार कराने की कोशिश की उससे साफ है कि पाकिस्तान किसी भी सूरत में कश्मीर को शांति की राह पर आगे बढ़ते हुए देखना बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। अमन में खलल डालने के लियेकिसी भी सरहद को पार करने का मंसूबा बनाकर बैठा है और उसी का नतीजा कभी संघर्ष विराम के तौर पर सामने आता है तो कभी सुंदरबनी। के घुसपैठ की शक्ल में। हालांकि इन तमाम खुराफातों का पाकिस्तान को बराबर से कहीं बढ़ कर माकूल जवाब दिया जा रहा है। लेकिन सवाल है कि कड़ा प्रतिउत्तर मिलने के बावजूद पाकिस्तान की भारत के प्रति रीति-नीति में कोई बदलाव या सुधार क्यों नहीं दिख रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह हमारे घर के ही वह भेदी हैं जिनसे पाकिस्तान को हौसला मिल रहा है कि कभी ना कभी वह पूरे कश्मीर पर कब्जा करने में कामयाब हो जाएगा। यह हौसला देने वाले केवल वे भटके हुए नौजवान ही नहीं हैं जिनको बरगलाकर आतंकी बनाया जा रहा है बल्कि वे अलगाववादी भी हैं जिनके बारे में जम्मू कश्मीर के गवर्नर ने कहा है कि वे पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से इजाजत लिये बिना पेशाब करने की भी जुर्रत नहीं कर सकते हैं। इसके अलावा पाकिस्तान को हौसला कश्मीर के उन राजनीतिक दलों से भी मिलता है जो सूबे को स्वायत्तता दिलाने की आड़ लेकर कश्मीर पर भारत की पकड़ को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं। अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिये जिस तरह से नेशनल काफैंस के अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर को स्वायत्तता दिये जाने की मांग को तूल देने की कोशिश की है वह निश्चित ही भारत के आम लोगों के भावनाओं के बिल्कुल ही विपरीत है और इसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है। उनकी इस मांग से यह भी साफ हो गया है कि सूबे के आम लोगों की बदलती भावनाओं और सोच से वे पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। वर्ना ना तो वे अनुच्छेद 35ए पर सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सनवाई के खिलाफ स्थानीय निकायों के चुनावों में हिस्सा लेने से परहेज बरतते, ना आतंक समूल नाश के लिये सेना व पुलिस द्वारा संयुक्त रूप से चलाए जा रहे आपरेशन आल आउट की कमियां व खामियां गिनाते और ना ही सूबे की स्वायत्तता की मांग करते। अगर उनकी भारत के हित के प्रति जरा भी जिम्मेवारी है तो उन्हें पाक अधिकृत कश्मीर के उन लोगों की तकलीफों को बुलंद आवाज में उठाना चाहिये था जो चीन और पाक के हितों की टकराहट में बुरी तरह पिस रहे हैं और पाकिस्तान के चंगुल से आजाद होने के लिये बुरी तरह छटपटा रहे हैं। लेकिन गुलाम कश्मीर में जारी पाकिस्तानी सेना के दमन-चक्र की अनदेखी करके कश्मीर घाटी के बारे में मनगढंत बातें करना और भारत के हितों के साथ खिलवाड़ करना उनके लिये सियासी तौर पर तो आत्मघाती रहने ही वाला है बल्कि इससे देश के हितों को जो नुकसान हो रहा है उसकी भरपाई करना भी कतई आसान नहीं है। उनके साथ कदमताल केवल कश्मीर की पीडीपी ही नहीं बल्कि खुद को राष्ट्रीय पार्टी कहनेवाली माकपा भी कर रही है और उसने भी कश्मीर के स्थानीय निकायों के चुनाव में हिस्से लेने से उसी वजह से इनकार कर दिया जो वजह इन दोनों दलों ने गिनाई थी। यानि सही मायने में देखा जाये तो पाकिस्तान के हौसले को पस्त कर पाना केवल इस वजह से संभव नहीं हो पा रहा है क्योंकि उसके मंसूबों को खाद-पानी की रसद सरहद के इस पार से ही मुहैया कराई जा रही है। लिहाजा आवश्यक है कि इन पाक-परस्त ताकतों को भारत के हितों से खिलवाड़ करने से रोका जाए और इसके लिये जो भी कदम उठाना पड़े उससे कतई संकोच नहीं किया जाए।