जेपी हॉस्पिटल में की गई उज़बेकिस्तान से आए 3.5 महीने के बच्चे की सफल लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लान्ट सर्जरी

3.5 वर्ष  के बच्चे ‘‘यह फैसला हमारे लिए बहुत मुश्किल था, लेकिन हमें खुशी है कि हमने यह जोखिम लिया। उजबेकिस्तान से आए साढ़े तीन महीने के बच्चे युसुफ के माता-पिता ने बच्चे के सफल इलाज के बाद कहा। हाल ही में नोएडा के जेपी हास्पिटल में बच्चे की लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लान्ट सर्जरी की गई है। बेबी युसुफ हाई रिस्क एंड स्टेज लिवर डिजीज (अंतिम अवस्था की लिवर की बीमारी) से पीड़ित था, यह एक गंभीर बीमारी है जिसमें लिवर के स्वस्थ टिश्यूज़ खराब हो जाते हैं और लिवर अपना काम ठीक से नहीं कर पाता। बच्चे के इलाज के लिए हाइपर रिड्युस्ड लिवर ग्राफ्ट ट्रांसप्लान्ट किया गया। दुनिया भर में एक साल से कम उम्र के बहुत कम मरीजों में इतनी मुश्किल सर्जरी को सफलतापूर्वक किया गया है। जुलाई 2018 में उजबेकिस्तान में पैदा हुआ युसुफ जुड़वा बच्चों में से एक था। 2.92 किलोग्राम वज़न के उजबेकिस्तान में लिवर रांसप्लान्ट के लिए आधनिक सविधाएं और इलाज उपलब्ध नहीं था। ऐसे में परिवार ने बच्चे को जेपी हॉस्पिटल लाने का फैसला लिया। यह फैसला बच्चे के लिए जीवनरक्षक साबित हुआ और बच्चे को यहां नया जन्म मिला। इस मामले के बारे में बताते हुए डॉ अभिदीप चैधरी, सीनियर कन्लटेन्ट, लिवर ट्रांसप्लान्ट डिपार्टमेन्ट, जेपी हॉस्पिटल ने कहा, “30 अगस्त को बेबी युसुफ़ को जेपी हॉस्पिटल में भर्ती किया गया। उस समय उसका जॉन्डिस 32 उध्कस से ज्यादा था जबकि सामान्य व्यक्ति में यह 10ऽसे कम होता है। उसका परा शरीर पीला पड़ चका था। पेट में पानी भरने के कारण पेट फूल गया था, जिसके कारण वह ठीक से सांस नहीं ले पा रहा था। इसलिए एक-एक दिन छोड़कर उसके पेट से पानी निकालना पड़ता था। बच्चा ठीक से फीड नहीं ले पा रहा था, ऐसे में वह इतनी मुश्किल सर्जरी के लिए कमजोर था। उसे रोजाना संतुलित और पोषक आहार देना जरूरी था। बेबी युसुफ को बार-बार इन्फेक्शन हो रहे थे, जिसके कारण उसे एंटीबायोटिक दवाएं देनी पड़ी। इन सब के कारण उसका विकास ठीक से नहीं पा रहा था। सर्जरी से पहले बच्चे को स्टेबल करने में हमें 10 दिन लगे।''‘‘बेबी युसुफ को लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लान्ट सर्जरी की जरूरत थी। उसकी मां की जांच करने से हमें पता चला कि उसकी मां उसे लिवर डोनेट कर सकती है। पीडिएट्रिक लिवर ट्रांसप्लान्ट के लिए हम डोनर के लिवर का बायां लोब लेते हैं। लेकिन बच्चा इतना छोटा था कि मां के लिवर का आकार युसुफ के पेट के लिए फिट नहीं था। 11 सितम्बर को हमने हाइपर रिड्युस्ड लिवर ग्राफ्टिंग की। इस प्रक्रिया में डोनर के लिवर का आकार मरीज़ की ज़रूरत के अनुसार कम किया जाता है। बहुत ध्यान से यह मुश्किल सर्जरी की गई, ताकि बच्चे की ब्लड वैसल्स या बाईल ड्रक्ट को कोई नुकसान न पहुंचे।'' डॉ चैधरी ने बताया। सर्जरी करने वाले डॉक्टरों की टीम में लिवर ट्रांसप्लान्ट सर्जन, एनेस्थेटिस्ट, पीडिएट्रिक क्रिटिकल केयर टीम एवं पीडिएट्रिक हेपेटोलोजिस्ट शामिल थे। सर्जरी के बाद बच्चे की खास देखभाल की गई, ताकि उसे इन्फेक्शन से बचा कर रखा जा सके। बच्चे का शरीर लिवर को रिजेक्ट न करे, इसके लिए इम्युनोसप्रेसिव दवाएं दी गईं। उसके कमजोर दिल और फेफड़ों को सपोर्ट करने के लिए उसे हाई फ्लो ऑक्सीजन पर रखा गया। पीडिएट्रिक इन्टेन्सिविस्ट और पीडिएट्रिक हेपेटोलोजिस्ट की टीम उसकी देखभाल कर रहे थे। लगभग एक महीने तक बेबी युसुफ को जेपी हॉस्पिटल में डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया। बच्चे की मां श्रीमति फेरूजा दुर्दैवा ने कहा, ''हम अपने बच्चे को उज्बेकिस्तन के कई अस्पतालों में ले गए, लेकिन इंटरनेशनल सुविधाओं की कमी के करण कोई भी डॉक्टर इसके इलाज के लिए तैयार नहीं हुआ। दिन-बदिन उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी। बीमारी के बारे में जानकारी जुटाने के बाद हमें पता चला कि डॉ अभिदीप चैधरी पहले भी इस तरह की सर्जरी सफलतापूर्वक कर चुके हैं, इसलिए हमने उसे जेपी हॉस्पिटल लाने का फैसला लिया। बेबी युसुफ को जन्म के 5-6 दिन बाद जॉन्डिस /पीलिया हो गया, जिसके कारण उसकी त्वचा पीली पड़ने लगी थी। स्थानीय पीडिएट्रिशियन को लगा कि यह आम फिजियोलोजिक जॉन्डिस है जो आमतौर पर बच्चों को जन्म के बाद हो जाता है और कुछ दिनों की देखभाल से बच्चा ठीक हो जाता है। लेकिन युसुफ ठीक नहीं हुआ, उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी। बाद में उसका अल्ट्रासाउण्ड करने से पता चला कि वह डी-कम्पन्सेटेड क्रोनिक लिवर डिजीज़ से पीड़ित है जिसके कारण उसे सिरोटिक लिवर के साथ एसाइट्स हो गया था। इस स्थिति में लिवर सिरहोसिस के कारण अपना काम ठीक से करना बंद कर देता है। 2.5 महीने बाद बच्चे के पेट में पानी भरने से पेट फूलने लगा। बेबी युसुफ़ को लगातार बुखार था और उसका लिवर फेलियर की कगार पर पहुंच गया था, ट्रांसप्लान्ट के बिना उसका बचना मुश्किल था।