कायाकल्प की राह पर कश्मीर

कायाकल्प की राह पर कश्मीर धरती का जन्नत कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर को जहन्नुम बना कर रख देने वालों के लिये वाकई बहुत ही बुरे दिन आ गए हैं। स्थिति यह है कि कश्मीर को आजाद कराने का ख्वाब देखने वालों पर चौतरफा मार पड़ रही है और स्थानीय लोगों से भी उन्हें किसी भी स्तर पर समर्थन नहीं मिल पा रहा है। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि कश्मीर की हालत देश के बाकी सूबों जैसी हो गयी है लेकिन इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि अब कश्मीर की समस्या का केवल इलाज ही नहीं हो रहा है बल्कि सही मायने में देखा जाये तो अब कश्मीर का पूरी तरह कायाकल्प होना आरंभ हो गया है। वर्ना जिस कश्मीर की सदर घाटी की बात तो दूर रही बल्कि उसकी राजधानी यानि श्रीनगर में स्थिति यह थी कि लालचैक पर तिरंगा फहराने के लिये जा रहे संसद के दोनों सदनों के तत्कालीन विपक्ष के नेता सुषमा स्वराज और अरूण जेटली को हिरासत में ले लिया गया और उन्हें बिना तिरंगा फहराए ही दिल्ली वापस लौटना पड़ा। उसी कश्मीर की स्थिति यह है कि अब घाटी के इलाकों में भी भाजपा को चुनावी सफलताएं मिल रही हैं और अलगाववादी ताकतों को स्थानीय लोग खारिज कर रहे हैं। अगर राष्ट्रवाद की धारा के साथ कश्मीर के आम लोगों का जुड़ाव ना बढ़ा होता तो सूबे में 13 साल बाद बीते 8 से 16 अक्टूबर के बीच चार चरणों में हुए कुल 1145 वार्ड के लिए शहरी निकाय के चुनाव कुल 35.1 फीसदी वोट नहीं पड़े होते और धुर राष्ट्रवादी भाजपा को जम्मू से लेकर आतंक प्रभावित घाटी के इलाकों में भी सफलता दर्ज कराने में कामयाबी नहीं मिल पाती। बेशक इस बार के चुनाव में जम्मू-कश्मीर की दो बड़ी स्थानीय पार्टियों नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने हिस्सा नहीं लिया था और राष्ट्रीय स्तर की पार्टी होने का दावा करनेवाली माकपा ने इन चुनावों का बहिष्कार किया था लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि इन तीनों के अलग हो जाने के बाद मतदाताओं के समक्ष कांग्रेस या भाजपा में से किसी एक को चनने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा। था। बल्कि सच तो यह है कि भाजपा और कांग्रेस के अलावा कई अन्य छोटी व स्थानीय पार्टियों सहित निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी इस बार के चुनाव में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था और कुल 1145 वार्ड के लिए। हुए इस चुनाव में 3372 उम्मीदवार मैदान में थे। यह चुनाव इस लिये। भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस प्रक्रिया को रोकने के लिये आतंकियों और अलगाववादियों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी और कश्मीर में लागू अनुच्छेद 35ए को लेकर जारी अदालती सुनवाई को लेकर अपना विरोध जताते हुए केवल नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने ही बल्कि सबसे बड़े वामपंथी दल माकपा ने भी चुनावों का बहिष्कार करके परोक्ष तौर पर चुनाव प्रक्रिया को बाधित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चुनाव प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं को डराने-धमकाने के अलावा प्रत्याशियों की हत्याएं भी की गई। इसी खौफ के माहौल का असर रहा कि कश्मीर के 598 वार्ड में से 181 सीटों पर किसी ने नामांकन दाखिल करने की भी हिम्मत नहीं दिखाई जबकि 231 सीटों पर केवल  एक-एक नामांकन ही दाखिल हो सका और उन सभी को निर्विरोध प्रत्याशी के तौर पर जीत दर्ज कराने का मौका मिल गया। लेकिन शेष 733 सीटों पर 3141 उम्मीदवारों के बीच जमकर चुनावी संघर्ष हुआ। जिसमें असली लड़ाई भाजपा और कांग्रेस के बीच ही हुई। इसमें लेह के इलाके में कांग्रेस ने सभी 13 वार्डों पर कब्जा करके क्लीन स्वीप किया जबकि जम्मू के इलाके में भाजपा को अपेक्षा के अनुरूप बेहतर प्रदर्शन करने में कामयाबी मिली। कश्मीर घाटी में भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर हुई जिसमें भाजपा के मुकाबले चार अधिक वार्डों में कामयाबी हासिल करके कांग्रेस ने आंशिक बढ़त ले ली। इसके अलावा तीसरी सबसे बड़ी ताकत के तौर पर निर्दलीय उभरे हैं जबकि नेशनल पैंथर्स पार्टी और पीपुल्स कॉन्फ्रेंस सरीखी छोटी स्थानीय ताकतों ने भी उल्लेखनीय सफलता अर्जित की। इस चुनाव की सबसे बड़ी बात यह रही कि जिस कश्मीर घाटी के श्रीनगर, बारामूला, कुपवाड़ा, बड़गाम, अनंतनाग, पुलवामा, शोपियां, कुलगाम, बांदीपोरा और गांदेरबल जिले में भाजपा सरीखी धुर राष्ट्रवादी पार्टी के लिये अब तक घुसने की राह नहीं। मिल पायी थी वहां इस बार उसने कांग्रेस को कड़ी टक्कर देते हुए 75 सीटों पर सफलता का परचम लहराया है। यानि सूबे के मतदाताओं ने स्पष्ट शब्दों में जता दिया है कि भारत के साथ रहने और यहां के संविधान और चुनाव व्यवस्था को तहे दिल से अंगीकार करने में वे देश के किसी भी सूबे से कतई अलग नहीं हैं। यानि अनुच्छेद 35ए की आड़ लेकर अलगाववाद के पक्ष में खड़े होने वालों के लिये अब अपनी सोच और नीति-नीयत में बदलाव करने का वक्त आ गया है क्योंकि अब कश्मीर की आबोहवा बदल रही है और वैचारिक, सैद्धांतिक व नीतिगत स्तर पर सूबे का पूरी तरह कायाकल्प हो रहा है। खास तौर से दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग, कुलगाम, पुलवामा और शोपियां सरीखे सबसे अधिक आतंकवाद और अलगाववाद प्रभावित जिलों के 132 में से 53 वार्ड में भाजपा के उम्मीदवारों का जीतना और खास तौर से शोपियां जिले के 12 वार्ड में भाजपा के उम्मीदवारों का निर्विरोध चुना जाना यह दर्शाने के लिये काफी है कि अब कश्मीर के लोगों पर भी ना सिर्फ राष्ट्रवाद का रंग चढ़ने लगा है बल्कि देश की आन, बान और शान के लिये कुर्बान हो जाने का जज्बा भी दिखने लगा है। ऐसे में आतंकियों को किसी भी इलाके में शरण नहीं मिलने और सेना व पुलिस के साथ आम लोगों द्वारा कंधे से कंधा मिलाकर आतंकवाद उन्मूलन अभियान में शिरकत किये जाने की तस्वीर का असली रंग अब चटख और गाढ़ा होते जाना तय ही है। अब कोई कारण नहीं है कि आतंक की आग में झुलसने की नियति को कश्मीर के लोग बदल कर ना रख दें। सही मायने में देखा जाये तो कश्मीर के लोगों ने बुलेट पर बैलेट की करारी चोट की है जिसका नतीजा सूबे के संपूर्ण के कायाकल्प के तौर पर सामने आने की सकारात्मक उम्मीद अब भरोसे में तब्दील होती दिखने लगी है।