मोदी सरकार की सैद्धांतिक समस्या

मोदी सरकार की सैद्धांतिक समस्या राम जन्मभूमि के मामले को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिये गये फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका पर तत्काल सुनवाई आरंभ करने के बजाय मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने इस पर जनवरी महीने में सुनवाई करने का फैसला करके एक तरह से इस मसले को सरकार के पाले में डाल दिया है। हालांकि सरकार की ओर से केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले पर औपचारिक प्रतिक्रिया देते हुए जो बात कही है उससे यह उम्मीद तो कतई नहीं जग रही है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये इस मौके को भुनाने के लिये वह अपनी ओर से कोई कदम उठाने की कोशिश भी करेगी। क्योंकि रविशंकर ने बेलाग लहजे में कह दिया है। कि सरकार को न्यायालय पर पूरा भरोसा है और न्यायालय के प्रति पूरा सम्मान भी है। लगे हाथों यह कह कर उन्होंने मामले को राजनीति से अलग रखने की सरकार की नीति का भी मुजाहिरा कर दिया कि बेशक उनकी इच्छा है कि वहां भगवान राम का भव्य मंदिर बने लेकिन यह आपसी सहमति से और बातचीत के माध्यम से ही होना चाहिये। यानि सरकार किसी भी सूरत में किसी एक पक्ष की ओर खड़े होने की दिशा में कोई पहलकदमी करने के मूड में नहीं दिख रही है। इसका साफ मतलब यही है कि भले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेकर संत समाज और हिन्दू जनभावना का इस बात के लिये प्रबल दबाव है कि सरकार संसद में अध्यादेश पारित कराके अयोध्या में भव्य राममंदिर के निर्माण की राह तैयार करे लेकिन सरकार फिलहाल इस विकल्प पर विचार करने के लिये भी तैयार नहीं है। अब सवाल है कि आखिर भाजपा ने वर्ष 1989 में पालमपुर अधिवेशन में जो घोषणा की थी उसकी क्या प्रासंगिकता रहेगी अगर उसकी सरकार मंदिर निर्माण की दिशा में कोई पहल ही नहीं करेगी। तो इसका सीधा जवाब यही है कि अदालत का फैसला सामने आने तक सरकार इस दिशा में कोई पहलकदमी नहीं करेगी लेकिन यह बताने का प्रयास करती रहेगी कि वह अयोध्या में मंदिर निर्माण के पक्ष में है। अर्थात एक बार अदालत का फैसला सामने आने के बाद ही इस दिशा में अगली पहलकदमी पर विचार किया जाएगा। हालांकि यह पहलकदमी मंदिर निर्माण को लेकर भी हो सकती है अगर सर्वोच्च अदालत ने पूरी विवादास्पद जमीन का मालिकाना हक मंदिर निर्माण के पक्षकारों को देने का फैसला नहीं सुनाया। साथ ही सरकार की पहलकदमी मस्जिद निर्माण को लेकर भी दिखने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता अगर पूरी जमीन सर्वोच्च न्यायालय ने मंदिर निर्माण के लिये दे दी। यानि दोनों ही सूरतों में सरकार को पहलकदमी तो करनी ही पड़ेगी। मंदिर निर्माण के लिये पूरी जमीन नहीं मिलने की सूरत में सरकार को एक अध्यादेश के माध्यम से विवादित जमीन पर राम मंदिर बनाने की पहल करनी पड़ेगी। ताकि उसके साथियों, सहयोगियों व समर्थकों से लेकर परंपरागत मतदाताओं तक की भावनाओं का सम्मान बरकरार रहे और उस पर अपने वायदे से पलटने की तोहमत ना लगे। लेकिन जब सरकार मंदिर निर्माण के लिये अध्यादेश लाएगी तो उसके साथ ही किसी अन्य जगह पर मस्जिद  निर्माण की राह भी सरकार को बनानी होगी ताकि वह कहीं से भी हिन्दू राष्ट्र की पक्षकार ना दिखाई पड़े और देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर उसकी पहलकदमी का कोई नकारात्मक असर ना पड़े। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने अगर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए विवादित जमीन का बंटवारा करने से इनकार कर दिया और पूरी जमीन मंदिर निर्माण के लिये दे दी तब भी सरकार को देश के मुसलमानों की भावनाओं का आदर करने के लिये बाबरी मस्जिद का निर्माण करने के लिये अलग से इंतजाम कराना ही पड़ेगा। वर्ना बाबरी की शहादत के बाद से ही भड़की। हुई भावनाएं पूरी जमीन मंदिर निर्माण के लिये दे दिये जाने के बाद आक्रोश के उबाल से भड़क सकती हैं और देश की धर्मनिरपेक्षता पर भगवा रंग हावी होने की संभावना उत्पन्न हो सकती है। यानि अदालत का जो भी फैसला हो उसमें सरकार को हस्तक्षेप करना ही होगा और उसकी मजबूरी हो जाएगी कि वह देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने और स्वरूप को मजबूत करने के लिये मुसलमानों के साथ किसी भी स्तर पर कतई अन्याय ना होने दे और उनकी भावनाओं का भी सम्मान करे। यह उलझन सरकार के संचालकों को अभी से बेहतर महसूस हो रही है और यही वजह है कि वे आनन-फानन में अध्यादेश लाकर पूरे मामले का एकपक्षीय निस्तारण करने का साहस नहीं दिखा पा रहे हैं। समाधान ढूंढा जा रहा है। आपसी बातचीत से मामले के निवारण का और यह बात सबको पता है। कि सिर्फ अदालत के आदेश से मामले का ऐसा हल नहीं निकल सकता जिससे सभी वर्गों को बराबर की अत्मसंतुष्टि मिल सके। लिहाजा एक वर्ग के दिल में कील ठुकनी तय है जिसका हाथों-हाथ निवारण करने की पहल नहीं की गई तो यह सामाजिक सौहार्द के लिये ऐसा नासूर बन जाएगी जिसका मवाद देश की गंगा-जमुनी सामाजिकता संरचना के लिये तेजाब साबित होगा। यही वजह है कि अदालती कार्रवाई से अलग हटकर दोनों पक्षों को इस बात के लिये मनाने की कोशिशें लगातार चलती रही हैं कि विवादित जमीन पर रामलला का मंदिर और इसके एवज में किसी अन्य स्थान पर एक बेहतरीन मस्जिद के निर्माण पर दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति बन जाए और राम मंदिर बनाम बाबरी मस्जिद के मामले का ऐसा समाधान निकले जिसमें दुनिया को दिखाया जा सके कि कैसे हिन्दुस्तान का मुसलमान जन्म भूमि पर मंदिर बनाने में सहयोग कर रहा है और देश का हिन्दू भी मुसलमानों के प्रति कृतज्ञता, सम्मान और अपनापन दर्शाते हुए उनके लिये दिव्य-भव्य मस्जिद बनवाने की पहल कर रहा है। यह काम सामाजिक स्तर पर हो और सरकार को इस मामले में हस्तक्षेप ना करना पड़े इसकी जुगत काफी लंबे से बिठाई जा रही है और ऐसा होने से ना सिर्फ भारतीयता की भावना को मजबूती मिलेगी बल्कि 'कसम राम की। खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे' का जयघोष करने वालों को मस्जिद बनवाने के लिये आगे आने की सियासी दुविधा का सामना भी नहीं करना पगा।।