नहीं सुधरे तो सर्वनाश तय

नहीं सुधरे तो सर्वनाश तय बीते दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने जहां एक ओर पंद्रह साल से अधिक पुराने पेट्रोल वाहनों और दस साल से अधिक पुराने डीजल वाहनों के इस्तेमाल पर दिल्ली में पाबंदी लगा दी वहीं दूसरी ओर दिवाली पर दिल्ली में केवल ग्रीन पटाखे फोड़ने को अनिवार्य करते हुए बाकी सभी पटाखों की खरीद, बिक्री व इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया। जाहिर तौर पर दिवाली के साथ पटाखों का पारंपरिक तौर पर चोली-दामन का साथ है लिहाजा इस पर। प्रतिबंध लगाए जाने को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की कटु आलोचना भी हुई है और उसके इस फैसले को मजहबी रंग देने का प्रयास भी किया गया है। लेकिन सवाल है कि आखिर यह नौबत आई ही क्यों कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसे फैसले लेने पड़े। बात सिर्फ सुप्रीम कोर्ट की होती तो इस पर टीका-टिप्पणी की भी जा सकती थी। लेकिन प्रदूषण के मामले को लेकर सरकार और प्रशासन का रूख भी सख्त दिख रहा है। जहां एक ओर पूर्वी दिल्ली में अवैध फैक्ट्रियों को सील करने का जोरदार अभियान चलाया गया है वहीं दूसरी ओर प्रदूषण फैलाने पर लगी पाबंदी का कड़ाई से अनुपालन कराने के लिए विभिन्न विभागों की 52 टीमें गठित की गई। हैं। प्रदूषण के प्रसार पर रोक लगाने के लिये बड़ी कार्रवाई करते हुए प्रगति मैदान से मथुरा रोड तक बनने वाली टनल का काम रुकवा दिया है। दूसरी ओर बीते चार दिन में 80 फैक्ट्रियों को सील किया जा चुका है। और कागजी तौर पर बंद दर्शायी जा रही व खाली बतायी जा रही 57 फैक्ट्रियों के बिजली मीटर और पानी कनेक्शन भी काट दिए गए हैं। शाहदरा, बाबरपुर, मानसरोवर पार्क, सुभाष पार्क, ब्रह्मपुरी, उस्मानपुर, गौतमपुरी, उस्मानपुर सहित अन्य इलाकों में कार्रवाई करते हुए 27 फैक्टरी सील की। गईं। यह अभियान युद्ध स्तर पर छेड़ा गया है और फैक्ट्रियों को सील करने की गति में आगे और तेजी लाए जाने का भरोसा दिलाया गया है। इसके अलावा दिल्ली सरकार से कहा गया है कि वह 400 टैंकरों से पानी का छिड़काव कराए। यानि केन्द्र सरकार से लेकर दिल्ली सरकार और नगर निगम भी प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई में कूद गए हैं। लेकिन दुखद बात यह है कि इस मामले में दिल्ली के आम लोगों के बीच जागरूकता का भी अभाव दिख रहा है और प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के अभियान में भागीदारी करने से भी आम लोग बचते दिख रहे हैं। जबकि प्रदूषण की सीधी मार आम लोगों पर ही पड़ रही है। डब्लूएचओ का सर्वेक्षण बताता है कि 2016 में भारत में 1,10,000 बच्चे जहरीली हवा के कारण असमय मृत्यु के शिकार हुए हैं जिसमें से पांच साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या 60,987 है तो बाकी संख्या पांच साल से 14 साल के बच्चों की है। इनमें भी बहुतायत तादाद दिल्ली और एनसीआर से ही सामने आई है। रिपोर्ट की मानें तो दिल्ली और इससे सटे हुए गुरूग्राम, फरीदाबाद, नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ और बुलंदशहर सरीखे तकरीबन 17 बेहद प्रदूषित शहर ऐसे हैं जहां की आबो-हवा सिर्फ खतरनाक ही नहीं बल्कि जहरीली हो चुकी है। मौसम विज्ञानियों के अनुसार जीने योग्य साफ वातावरण की प्राथमिक अनिवार्यता है कि इसमें पीएम-10 का स्तर 100 से अधिक और पीएम-2.5 का स्तर 60 एमजीसीएम से अधिक नहीं होना चाहिए। जबकि दिल्ली की बात करें तो यह मानक पूरी तरह ध्वस्त होता हुआ नजर आ रहा है और आलम यह है कि इन दिनों दिल्ली व एनसीआर के अधिकांश इलाकों में प्रदूषण मानक पीएम-10 का स्तर 700 से ऊपर ही मापा जा रहा है। जिस मानक को 100 से अधिक नहीं होना चाहिये वह कहीं भी और किसी भी समय में साढ़े चार सौ से कम के स्तर पर दर्ज नहीं हो पा रहा है। नतीजन फेफड़ों व हृदय से संबंधित बीमारियां बेहद आम होती जा रही हैं। लगातार कैंसर के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की जा रही है और विदेशी सैलानियों की आवक में निरंतर गिरावट का रूख देखा जा रहा है। वैश्विक पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (ईपीआई) 2018 के अनुसार भारत 30.57 के ईपीआई के साथ प्रदूषण के मामले में दुनियां का 177 देश हो गया है। यानि विश्व के 176 देश ऐसे हैं जिनकी आवो-हवा भारत से बेहतर है। निश्चित ही यह स्थिति बेहद ही शर्मनाक भी है और खतरनाक भी। उसमें भी देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में गिना जाने लगा है। दुनिया भर में घर और बाहर के वायु प्रदूषण से प्रतिवर्ष 30 लाख मौतें होती हैं, इनमें से सबसे ज्यादा भारत में होती हैं। आलम यह है कि देश की राजधानी दिल्ली और इससे सटे हुए इलाके नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जन के विश्व के तीन सबसे बड़े ‘‘हॉटस्पॉट' में शामिल हैं। दुखद बात यह है कि दिल्ली को दमघोंटू और जानलेवा जहरीली हवा का गैस चैंबर किसी अन्य ने नहीं बल्कि दिल्ली के लोगों ने ही बनाया हुआ है। कहने को भले ही पड़ोसी राज्यों में जलाई जा रही पराली पर दिल्ली के प्रदूषण का ठीकरा फोड़ दिया। जाता हो लेकिन सच तो यह है कि दिल्ली में प्रदूषण के खतरनाक अंजाम के बारे में ना तो लोगों को जानकारी है और ना ही जानकारी लेने के लिये ये लोग उत्सुक हैं। अगर जानकारी हो जाएगी तो इससे निपटने में भागीदारी भी करनी होगी। लिहाजा कौन इस पचड़े में पड़े। दिल्ली वालों की बला से अगर प्रदूषण के कारण बीमारियां फैल रही हैं और लोगों की मौतें हो रही हैं तो होती रहें। वे अपनी मस्ती में कोई कसर नहीं छोड़ सकते। बीते साल दिवाली पर एनजीटी ने पटाखों पर प्रतिबंध लगाया लेकिन किसी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। सबने लुक-छिपकर जमकर पटाखे जलाए जिसके नतीजे में दिवाली की रात पीएम-10 का स्तर 900 के पार चला गया। इसी प्रकार दिल्ली के प्रदूषण स्तर में 41 फीसदी की भागीदारी वाहनों की है। सवा करोड़ की आबादी वाली दिल्ली में तकरीबन 110 करोड़ वाहन हैं जो डीजल-पेट्रोल से चलते हैं। इनमें 40 लाख पुराने वाहन हैं। जिन्हें अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हाटाने की कार्रवाई शुरू हुई है। जाहिर है कि अगर दिल्ली के लोग खुद ही जागरूक नहीं होंगे तो कोई कोर्ट, सरकार या व्यवस्था यहां की स्थिति को कतई नहीं सुधार सकती है। सुधरना यहां के लोगों को ही होगा और अपनी सोच को बदलने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है वर्ना दिल्ली में सर्वनाश के हद तक बीमारियों से मौत का तांडव देखने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं हैं।