न्यायपालिका का दायरा

न्यायपालिका का दायरा हालांकि न्यायपालिका के लिये दायरे की बात कहने और सुनने में अजीब लग सकती है लेकिन सबरीमला मामले में सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले को देखते हुए यह चर्चा अवश्य की जानी चाहिये कि आखिर क्यों ना न्यायपालिका के लिये भी एक दायरा निश्चित किया जाए। वैसे भी आस्था का मामला ऐसा होता है जहां किसी भी तर्क-वितर्क या विधि-व्यवस्था के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जाता है। ऐसे में अचानक से सदियों पुरानी व्यवस्था को असंवैधानिक बताकर खारिज कर देना एक तरह से आस्था पर कुठाराघात सरीखा है जिसे किसी भी सूरत में प्राकृतिक न्याय का नाम नहीं दिया जा सकता है।  सबरीमला में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश की बात हो या दीवाली में पटाखे जलाने की या जल्लीकट्ट पर प्रतिबंध लगाने की अथवा विवाहेत्तर संबंधों को नाजायज व गैर-कानूनी मानने से इनकार करने की। यहां तक कि नमाज पढ़ने के लिये मस्जिद की अनिवार्यता को नकारने की बात ही क्यों ना हो। बीते कुछ दिनों में अदालतों से ऐसे फैसले सामने आए हैं जिससे समाज की आस्था, प्राकृतिक व्यवस्था और सदियों पुरानी परंपरा पर ऐसा कुठराघात हुआ है कि आम लोग हतप्रभ हैं। इन फैसलों को लेकर समाज के बहुत बड़े वर्ग में बेचैनी और अस्वीकार्यता का ही नहीं बल्कि आक्रोश का भी माहौल है। अगर इन मामलों में वाकई किसी लिंग या वर्ग के साथ कोई अन्याय हो रहा होता तो अदालत द्वारा मामले में हस्तक्षेप किये जाने की बात का औचित्य समझा जा सकता था। लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा है। एक ऐसे वर्ग को उसकी आस्था, मान्यता व परंपरा का अनुपालन करने से वंचित करने का प्रयास किया गया है जिससे किसी का कोई नुकसान नहीं हो रहा था। ऐसे में अदालत ने जो फैसला दिया है उस पर निश्चित ही पुनर्विचार की जरूरत है ताकि बदलाव व बराबरी का हक देने के नाम पर समाज के बहुत वर्ग की आस्था के साथ जो खिलवाड़ होने की संभावना उत्पन्न हो गयी है उसे टाला जा सके। वैसे भी न्यायपालिका जिस तरह से हर मामले में हस्तक्षेप करने की राह पर आगे बढ़ रही है और काफी हद तक ऊट-पटांग फैसले दे रही है उसका कोई मतलब या औचित्य ही नहीं है। मिसाल के तौर पर सबरीमला के मामले में अदालत का जो फैसला आया है उसका कोई औचित्य समझ से परे है। अगर किसी खास धार्मिक स्थल पर यह परंपरा है कि वहां दस से पचास साल की आयुवर्ग की महिलाएं प्रवेश ना करें तो इसमें असहज करनेवाली कौन सी बात है? वह भी तब जबकि जिस धर्म के मानने वालों का यह मंदिर है उस समाज की महिलाओं को इस व्यवस्था से कोई आपत्ति ही नहीं है। लेकिन इस व्यवस्था के खिलाफ अदालत का रूख करने के बाद मिले कथित न्याय का लाभ लेकर जिस तरह से मंदिर को अपवित्र करने की कोशिशें की जा रही हैं उसे देखते हुए यह समझना मुश्किल नहीं है कि ऐसा करके समाज की उस सद्भावना को खंडित करने का प्रयास हो रहा है जिसके साथ छेड़छाड़ करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। यह तो लोक परंपरा में भी शामिल है कि कई रीति-रिवाजों में कई तरह की बंदिशों का पालन करना होता है। लेकिन उन बंदिशों का मकसद सिर्फ अनुष्ठान्न को पारंपरिक तौर पर संपन्न कराना होता है ना कि किसी को नीचा दिखाना अथवा किसी का अधिकार छीनना । उसी प्रकार दीवाली पर पिछले साल जिस तरह से पटाखे जलाने पर प्रतिबंध लगाया गया था वह भी लोक परंपरा पर कुठाराघात ही था क्योंकि अगर पर्यावरण की सुरक्षा का ही मामला था तो सरकार को यह निर्देश दिया। जाना चाहिये था कि वह निश्चित सीमा से अधिक प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों का निर्माण रूकवाए। जाहिर है कि जब प्रदूषण के स्तर को ध्यान में रखकर ही पटाखों का निर्माण होगा तो लोग भी उसका ही इस्तेमाल करेंगे। लेकिन ऐसा करने के बजाय सिर्फ दीवाली के मौके पर पटाखे जलाने को प्रतिबंधित करने से उस त्यौहार को मनानेवालों की आस्था व मान्यता पर ही नकारात्मक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। वह तो गनीमत है कि इस बार कुछ शर्तों के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने दीवाली पर पटाखे जलाने की अनुमति दे दी है वर्ना आम लोगों का असंतोष एक बार फिर आक्रामक होकर अवमानना की हद के आगे निकल सकता था। इसी प्रकार का मामला नमाज पढ़ने को लेकर भी है कि इसके लिये मस्जिद की कोई अनिवार्यता ही नहीं। है। माना कि मस्जिद जाकर नमाज पढ़ना अनिवार्य नहीं है लेकिन मस्जिद तो उपासना स्थल ही है जिसकी आवश्यकता हर इस्लामिक आस्थावान के लिये उतनी ही है जितनी किसी ईसाई के लिये चर्च की, हिन्दू के लिये मंदिर की, सिख के लिये मस्जिद की या पारसी के लिये आतिश बेहराम की। इसी । प्रकार धारा 497 को खारिज करके विवाहेत्तर संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर कर देना भी ऐसा ही फैसला था जिससे समाज की विवाह व्यवस्था के अप्रासंगिक हो जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है। जिस विवाह व्यवस्था को सभ्य समाज के लिये अनिवार्य माना गया और शारीरिक संबंधों की आवश्यकता को नैतिकता के दायरे में बांध कर उसे नैतिक मूल्यों के संवर्धन का माध्यम बनाया गया उसे ही जड़ से उखाड़ दिये जाने के बाद अब विवाह की उस पूरी व्यवस्था पर भी प्रश्नचिन्ह लग गया है जिसके तहत शारीरिक संबंध के माध्यम से संतान प्राप्ति व व्यक्तियों को जोड़कर परिवार का निर्माण करके उसे समाज की इकाई बनाने के लिये इसे प्रचलन में लाया गया था। अब समाज और व्यक्ति के बीच की वह धुरी टूटने का मार्ग प्रशस्त हो गया है जिसे परिवार कहते हैं। ऐसे और भी कई मामले हैं जिसमें न्यायिक हस्तक्षेप की ना तो आवश्यकता थी और ना ही ऐसे फैसले देने का कोई औचित्य था जो प्राकृतिक न्याय की कसौटी पर खरा ना उतरता हो। अगर सबरीमला में रजस्वला महिला को प्रवेश नहीं देने की व्यवस्था है अथवा पुरी के जगन्नाथ मंदिर में विजातियों को प्रवेश नहीं देने की परंपरा है तो इसमें उस सदियों पुरानी परंपरा का आदर किया जाना चाहिये क्योंकि हर स्थान की एक मर्यादा होती है जिसका अनुपालन करने से किसी के साथ कोई अन्याय नहीं होता। है। न्यायपालिका को वहीं हस्तक्षेप करना चाहिये जहां किसी के साथ कोई अन्याय हो रहा हो या उसका अधिकार लिंग,संप्रदाय अथवा जाति के आधार पर छना जा रहा हो। लेकिन अगर अपने धर्म की परंपराओं का अनुपालन करने का अधिकार संविधान ने दिया हुआ है तो फिर उसे शरारती तत्वों की खुराफाती याचिकाओं पर सुनवाई के बहाने प्रभावित नहीं किया जाना चाहिये।