सामाजिक समरसता पर हुआ भाव प्रधान कवि सम्मेलन

 गाजियाबाद। देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था अखिल भारतीय संस्कृति समन्वय समिति के तत्वावधान में रॉयल किड्स सभागार में सामाजिक समरसता पर कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस कवि सम्मेलन में कवियों और शायरों ने देश की वर्तमान स्थितियों पर अपने खूब व्यंग्य बाण छोड़े। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रज्ञान पुरुष पण्डित सुरेश नीरव, जो कि कवि सम्मेलन के अध्यक्ष भी थे, ने अपनी शायरी के जरिए वर्तमान परिस्थितियों पर तंज करते हुए कहा कि- खेल नंगेपन का पूरी शान पर है, आजकल यारों पतन उत्थान पर है। वहीं राजनैतिक व्यवस्था और बेरोजगारी पर व्यंग्य करते हुए उन्होंने कहा कि- नहीं हैं डिग्रियां कोई मगर कर्सी संभाले हैं, हकीकत में जो लायक हैं उन्हें रोटी के लाले हैं। कवि और पत्रकार राजेश्वर राय ने अपने ही अंदाज में कहा- मैं अपनी सोच का शागिर्द हं, उस्ताद क्यूं रक्खू। मेरा अपना पयाम है, मेरा त्रेता युगअपना दर्द कुछ इस अवघाव वही अपना मकाम है। गुरु ग्राम से आए श्याम स्नेही ने अपनी कविता के जरिए आज के आदमी के संघर्ष का बखान कुछ इस प्रकार किया- मत जल मानव तू सियासत की आग में। जिंदगी बीतती जाती है भागम-भाग में। स्नेह- सौहार्द्र तले तो जी कर देख भला,क्या रखा है ईष्या-द्वेष अहंकार के राग में। दिल्ली से आई कवयित्री सविता चट्टवा ने अपना दर्द कुछ इस तरह बयां किया- दे जाते हैं जिसको अपने, घाव वही गहरा होता है। गैर भले ही कितना अच्छा, अपना फिर अपना होता है।कवयित्री पूनम माटिया ने यादों की तासीर को कुछ इस तरह रेखांकित किया- याद उनकी इस कदर हावी हुई। डूब कर ये दिल उबरता ही नहीं। बाद पूनम के अमावस है मगर, चांद जिद्दी है ठहरता ही नहीं। डॉक्टर सतीश वर्धन ने आज के परिवेश में मासूमों के साथ हो रहे अपराध पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा- जीना मुश्किल हो गया है आज के परिवेश में। ज्यादा घृणित और घिनौना घट रहा है देश में। चिड़ियों जैसी बच्चियों की हम स्वयं रक्षा करें। बाज भी कुछ घूमते हैं। आदमी के वेश में। फरीदाबाद से आए ग़ज़लकार आलोक यादव ने अपने शेरों से महफिल में एक नया ही रंग भर दिया- सूप चलनी से भी बढ़कर निकले। छेद उनमें भी बहत्तर निकले। दफ्तरों में न मिला एक इंसा।