सीबीआई का संग्राम

सीबीआई का संग्राम देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई में छिड़ा संग्राम जिस तरह से सामने आया है वह निश्चित ही दुखद, दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है। यह देश की सबसे भरोसेमंद एजेंसी भी है और कहीं कोई मामला हो तो इसकी निष्पक्षता पर भरोसे के कारण ही मामले की सीबीआई से जांच कराए जाने की मांग की जाती है। ऐसे में अगर इस एजेंसी के दो सबसे बड़े अधिकारियों पर रिश्वतखोरी करने और अपराधी को बचाने का आरोप लगे तो यह निश्चित ही इस एजेंसी की साख को खराब करनेवाली बात है। लेकिन दुर्भाग्य से यह हुआ है और इस हद तक मामला आगे बढ़ गया कि बात एफआईआर दर्ज कराने तक पहुंच गयी। हालांकि सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच अनबन व मनमुटाव की बात नयी नहीं है। यह बीते एक साल से राजनीतिक व नौकरशाही गलियारे में चर्चा का विषय बना हुआ था। यहां तक जब अस्थाना की प्रोन्नति की बात उठी तब वर्मा ने औपचारिक तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर आगाह किया था कि उन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं लिहाजा उन्हें प्रोन्नति नहीं दी जानी चाहिये। इसके अलावा अस्थाना ने भी चीफ विजिलेंस कमिश्नर यानि सीवीसी को वर्मा के खिलाफ औपचारिक तौर पर शिकायत की थी और कथित तौर पर कुछ साक्ष्य भी मुहैया कराए। गए थे। यहां तक कि मीडिया में भी उन दोनों के खेमे से एक दूसरे के खिलाफ जानकारियां लीक की जाती थीं और चरित्र हनन का पुरजोर प्रयास होता था। यानि सीबीआई की जो बीमारी अभी सतह पर आयी है उसका नासूर काफी दिनों से अपनी जड़ें मजबूत कर रहा था। लेकिन चूंकि सीबीआई को स्वायत्त संस्था का दर्जा हासिल है लिहाजा इसके अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने से सरकार भी बच रही थी और मामले मेंयथास्थिति बरकरार रखते हुए तटस्थ भाव से दोनों अधिकारियों के बीच जारी शीत युद्ध को देख रही थी। सरकार की तटस्थता का ही नतीजा था। कि वर्मा द्वारा पत्र लिखकर अस्थाना की प्रोन्नति को रूकवाने के प्रयास का भी संज्ञान नहीं लिया गया और अस्थाना को वर्मा के विरोध के बावजूद प्रोन्नति दे दी गयी। यह मामला आगे भी इसी तरह चलता रहता अगर अस्थाना के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं कराया जाता और उनको गिरफ्तार करने की कोशिश नहीं की जाती। लेकिन दुर्भाग्य से मामले की इंतहा तब हो गयी जब मामला अदालत की चैखट पर पहुंच गया और हाईकोर्ट को। हस्तक्षेप करके अस्थाना की गिरफ्तारी पर रोक लगानी पड़ी। उसके बाद बचाने या छिपाने के लिये कुछ बाकी नहीं रह गया और मामला आ गया सीबीआई की साख पर कि आखिर जिस संस्था के शीर्ष दो अधिकारी एक दूसरे पर भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी का आरोप लगा रहे हों और मामला। अदालत में लंबित हो वह संस्था किस तरह से विश्वसनीय मानी जा सकती थी। ऐसे में सरकार के पास हस्तक्षेप करके मामले को संभालने और सीबीआई की साख को बचाने के लिये तमाम कदम उठाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं बच गया। लेकिन इस हस्तक्षेप में भी नैतिकता, शुचिता, निष्पक्षता और वैधानिकता का पूरा ध्यान रखा गया। मसलन लंबी छुट्टी पर दोनों को भेजा। एसआईटी से जांच दोनों की कराने की घोषणा हुई। दोनों के कार्यालय में बराबर तलाशी हुई और दोनों के साथ एक सरीखा सलूक किया गया। यहां तक कि विभाग में नंबर तीन माने जानेवाले को ही संस्थान का कार्यवाहक बनाया गया और दोनों के करीबियों को ताश के पत्तों की तरह फेंट कर तबादले किये गये। यानि सरकार पर इन दोनों में से किसी के साथ पक्षपात करने का आरोप कतई नहीं लगाया जा सकता है। बेहतर होता कि सरकार द्वारा विवशता में उठाए गए इस कदम का विपक्ष  भी एहतराम करता और दोनों आरोपी भी सम्मान करते। लेकिन एक ओर विपक्ष ने राजनीतिक लाभ लेने के लिये परे विवाद को राफेल डील से जोड़ने की भरसक कोशिश की है जबकि वर्मा तो सर्वोच्च अदालत ही पहुंच गए हैं। खैर वर्मा के मामले में अब आगामी शुक्रवार से सुनवाई की तारीख भी मुकर्रर हो गयी है लिहाजा अदालत की ओर से जो भी फैसला आए उस पर सही समय पर अवश्य ही विवेचना होगी। लेकिन पूरे मामले को लेकर जो पहलू खास तौर पर उभरा है वह यही है कि सरकार के खिलाफ विपक्ष के पास मुद्दों का भारी दिवालियापन है। वर्ना सीबीआई के शीर्ष अधिकारियों के अंदरूनी टकराव के मामले को राफेल खरीद से जोड़कर सरकार पर प्रहार करने की ना तो कोई आवश्यकता है और ना ही ऐसा किया जाना अपेक्षित था। वैसे भी यह सामान्य समझ की बात है कि आखिर राफेल खरीद के मामले से सीबीआई का क्या संबंध हो सकता है? अगर मामले की जांच सीबीआई के सुपुर्द की गई होती तो इन आरोपों या आशंकाओं को सही माना भी जा सकता था। या फिर अगर सरकार ने इस मामले में किसी के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया होता तब भी विपक्ष का मामले को उठाना सही माना जा सकता था। यहां तक कि अगर अनाधिकार हस्तक्षेप करके बिना जांच के ही किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई। होती तब भी मामले के राजनीतिकरण की आवश्यकता को समझा जासकता था। लेकिन जब ऐसा कुछ भी नहीं है तब केवल सरकार को नीचा दिखाने के लिये विरोध दर्ज कराना और चैकीदार चोर है' सरीखे गैरजिम्मेदाराना नारे लगवाना कैसे सही या समझदारी भरा माना जा सकता है। बेशक विपक्ष के इस अंध विरोध से सरकार की सेहत पर कोई फर्क नहीं। पड़ने वाला है लेकिन इसका यह असर अवश्य होगा कि अगर विपक्ष ने सही व समझदारी भरी राह नहीं पकड़ी तो उसके लिये जन सामान्य के बीच विश्वसनीयता का संकट अवश्य उत्पन्न हो सकता है। वैसे भी देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी की साख दांव पर लगना पूरे देश के लिये चुनौतिपूर्ण स्थिति है लिहाजा इसे सिर्फ सरकार की सिरदर्दी मान कर अपना पल्ला झाड़ लेना किसी भी जिम्मेवार नागरिक से अपेक्षित नहीं हो सकता है। अगर एक मिनट के लिये विपक्ष की बात मान भी ली जाए कि सरकार ने पूरे मामले में बहुत ही गलत किया है तो क्या विपक्ष यह बताने की स्थिति में है कि आखिर सरकार को पूरे मामले में क्या करना चाहिये था ताकि सीबीआई की साख भी सलामत रहे, दोषियों की पहचान भी हो और निर्दोष को प्रताड़ना से भी बचाया जा सके?