सुषमा अपनी खूबियों के कारण ही लंबे समय तक विदेश मंत्री के रुप में बनी पहली महिला

 सुषमा स्वराज विदेश मंत्री के रूप में पांच साल पूरे करने जा रही हैं। इस मंत्रालय का पूर्णकालिक प्रभार संभालने वाली वह पहली और इकलौती महिला हैं। अतीत में इंदिरा गांधी भी इसका प्रभार संभाल चुकी हैं, लेकिन तब वह प्रधानमंत्री भी थीं। यह एक ऐसी उपलब्धि है, जिस पर सुषमा गर्व कर सकती हैं, न सिर्फ महिला होने के नाते, बल्कि इसलिए भी कि ऐसे बहुत कम विदेश मंत्री हुए हैं जिन्होंने इतने लंबे समय तक यह पदभार संभाला हो। सुषमाजी में कई ऐसी खूबियां हैं, जिनकी वजह से प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें इस जिम्मेदारी के लिए चुना होगा। उनकी पहली खूबी है उनका स्वाभाविक शिष्टाचार। सुषमाजी का शिष्टाचार उनके व्यक्तित्व, उनके स्वभाव में झलकता है। उनकी दो और खूबियां हैं- उनका हिंदी में धाराप्रवण होना और उनकी मददगार प्रवृत्ति। हिंदी के मुक्त-विचारक कवि सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला' की अविस्मरणीय कविता ‘बांधो ना नाव' में एक पंक्ति आती है-'सबकी सुनती थी, सहती थी, फिर भी अपने में रहती थी..।' सुषमाजी अपने में रहती हैं। उनका स्वभाव है अपनी भावनाओं को अपने तक सीमित रखना। वह खुद अपने फैसले लेने का अधिकार सुरक्षित रखती हैं। किसी भी तरह के इवेंट्स, संस्थाओं, व्यक्तियों के बारे में उनके अपने स्पष्ट विचार होते हैं। राजनीतिक गतिविधियों के प्रतिउनकी अपनी व्याख्या होती है। इसी तरह भाजपा के और दूसरी पार्टियों के नेताओं के बारे में उनका अपना आकलन है। यानी सबकुछ अपने में। उनके स्वभाव में एक अंदरूनी स्थिरता है। यह उनके भीतर का आत्मविश्वास, धैर्य ही है, जो उन्हें शक्ति देता है। वह दूसरों की विचारधाराओं के प्रति खुली सोच रखती हैं। भाजपा के दर्शन के प्रति उनकी निष्ठा अडिग है, लेकिन उनके भीतर कहीं न कही एक सोशल डेमोक्रेट भी छिपा है। इस मामले में उन पर उनके पति स्वराज कौशल का बड़ा प्रभाव लगता है। वह जिस तरह स्वाभाविक विनम्रता के साथ अपने सियासी विरोधियों से तादात्म्य स्थापित करती हैं, वह मुझे लगता है कि उन्हें उनकी पार्टी के लिए भी एक पहेली बना देता है। वह अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करती हैं, लेकिन उनका अपना स्वभाव उन्हें गर्मजोश इंसान बनाता है। वह विरोध करती हैं, लेकिन किसी को अपमानित नहीं करतीं या ठेस नहीं पहुंचातीं। उनसे ऐसा होगा ही नहीं। यह उनका स्वभाव ही नहीं है। वह अपनी राजनीतिक आस्थाओं के प्रति किसी को संशय में नहीं रखतीं, किंतु इसके साथ-साथ उनकी राजनीतिक शिष्टता भी संदेह से परे है। वह आज ऐसी व्यवस्था में नैसर्गिक लोकतंत्रवादी हैं, जहां पर भागीदारी के बजाय आज्ञाकारिता का, विशिष्टता के बजाय आंकड़ेबाजी का जोर है। उनकी शब्दावली भले ही ‘संघ-शब्दकोश' या उनके स्वजनों से आई हो, किंतु उनकी सोच, उनके विचार ‘सुषमा- विचार-कोश' और उनके स्वभाव से आते हैं। वह उनके शिष्टाचार में झलकते भी हैं। तो क्या यह द्वंद्व, यह दुविधा उन्हें परेशान करती है? जरूर करती है। वह भी इंसान हैं, किंतु उन्होंने खुद को इसमें प्रवीण कर लिया है कि अपनी दुविधा को लॉकेट में कैद कर अपने दिल के करीब रख सके। जिंदगी में कई ऐसे पल आते हैं, जब व्यक्ति को किसी चीज का चयन करना होता है। चयन करना मुश्किल काम नहीं है, लेकिन कई बार विकल्प स्पष्ट रूप से सामने नहीं आते। कभी-कभार किसी को ऐसी चीज के मध्य भी चयन करना होता है, जो सही है। और जो गलत भी नहीं है। एक वाकया याद आता है। 25 वर्षीय केआर नारायणन ने गांधीजी से पूछा कि यदि किसी व्यक्ति से ऐसी दो राहों के बीच चयन करने के लिए पूछा जाए, जिनमें दोनों ही सही हों तो उसे क्या करना चाहिए। उस वक्त नारायणन टाटा स्कॉलरशिप पर लंदन जा रहे थे। उन्हें तनिक असंतुष्टिजनक जवाब मिला। तब उन्होंने गांधीजी से कहा कि लंदन में उनसे हरिजन (उस वक्त तक 'दलित' शब्द चलन में नहीं आया था) समस्या के बारे में जरूर पूछा जाएगा। इसके बाद वह बोले-‘यदि इसके बारे में पूछा जाता है तो मुझे एक हरिजन के रूप में जवाब देना चाहिए या एक भारतीय के रूप में? यह असल दुविधा थी।' मेरी याद्दाश्त के मुताबिक तब गांधीजी ने कहा, 'जब आप विदेश में हो तो कहें कि यह भारत की अंदरूनी समस्या है और जब हमारा देश आजाद हो जाएगा तो इस समस्या को भी सुलझा लेगा।' कूटनीतिक अक्लमंदी के लिहाज से गांधीजी द्वारा सुझाए गए इस जवाब से बेहतर जवाब आज विदेश मंत्रालय का सर्वाधिक काबिल ड्राफ्ट्स मैन भी पेश नहीं कर सकता। सुषमाजी को भी प्राय-खुद से ऐसे प्रश्न पूछने चाहिए। मुश्किलों के बीच ऐसी दुविधाओं में उनकी शिष्टता भी कसौटी पर रहती होगी। हाल में संयुक्त राष्ट्र महासभा में उनका भाषण सुनकर लगा कि वह यूएन के बजाय किसी भारतीय सार्वजनिक सभा को संबोधित कर रही हैं। उनके इस भाषण को मैं उनकी उसी विकट दुविधा के उत्पाद के तौर पर देखता हूं-उनके शिष्टाचार का कर्म और उनके स्वभाव का धर्म। मैं सुषमाजी को लगभग बीस साल से जानता हूं और इस नाते मैं उनकी शिष्टता और उनके स्वभाव दोनों की सराहना करता हूं। उन्होंने अपनी दुविधा और द्वंद्व को जिस परिपक्वता, धैर्य और सफलता से साधा है, उसके लिए मैं उनका सम्मान करता हूं, लेकिन मैं यहां अपनी बातों को कुछ और विचारों के साथ विराम देना चाहूंगा, जो उनके परे, एक व्यक्ति के परे जाते हैं। हमारा संविधान राजनीतिक दलों का जिक्र नहीं करता। इसे इसी तरह तैयार किया गया था। इसकी विषयवस्तु में दलों का हवाला तब जाकर आया, जब संशोधन द्वारा एक दल से दूसरे दल में जाने का विषय इसमें जोड़ा गया। इसका क्या आशय है? आशय यह है कि हमारे सांसदों/मंत्रियों को अपने विचारों और चेतना के साथ एक स्वतंत्र व्यक्ति होना चाहिए। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके भी अपने विचार हैं और हर किसी को (सरकार में हो या विपक्ष में) अपने नेता को अपने विचारों से अवगत कराने से हिचकना नहीं चाहिए। याद करें कि फिरोज गांधी ने मूंदड़ा स्कैंडल के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी का इस्तीफा मांगने से परहेज नहीं किया था और ऐसा हुआ भी। खामोशी भी बोलती है। शोरशराबा करने वालों की भीड़ में, जो शांत रहता है, उसकी ‘सुनी' जाती है। तंज-उपहास करने वालों की भीड़ में, जो शांत बना रहता है। वही फर्क लाता है। एमजे अकबर (जो उनके ही राज्यमंत्री थे) के मामले में सुषमा की खामोशी ने बहुत कुछ कह दिया। उस वक्त वह साफ तौर पर अपने में थीं। ऐसी खामोशियां आगे भी नजर आएं। सुषमाजी की खामोशी ही सही, बोलती रहे। भले ही वह शिष्ट बनी रहें, लेकिन विशिष्ट होने का अपना तरीका भी तलाशें।