व्यक्ति पर व्यवस्था को तरजीह

व्यक्ति पर व्यवस्था को तरजीह सीबीआई के दो शीर्षतम अधिकारियों आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के आपसी झगड़े के कारण प्रभावित होती संस्था की साख को बचाने और दोनों द्वारा एक-दूसरे पर लगाए जा रहे आरोपों की निष्पक्षता के साथ जांच सुनिश्चित कराने के मकसद से सरकार द्वारा उठाये गये कदमों पर अपनी सहमति की मुहर लगाकर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि बात जब व्यक्ति और व्यवस्था में से किसी एक को बचाने की आएगी तो व्यक्ति के बजाय व्यवस्था को ही तरजीह दी जाएगी। दरअसल सरकार ने सीवीसी की सिफारिश पर वर्मा और अस्थाना को छुट्टी पर भेजकर सीबीआई की साख बचाने और मामले की निष्पक्ष जांच के लिए एसआईटी गठित करने की जो पहल की थी उसको लेकर राजनीतिक स्तर पर भी सरकार की कटु आलोचना हो रही थी और वर्मा ने तो तमाम तरह की तोहमतें लगाकर सरकार की नीति और नीयत पर सवाल उठाते हुए इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने वर्मा की बातों को कतई तरजीह नहीं देते हुए मामले में सरकार द्वारा बनाई गई व्यवस्था को बरकरार रखने की जो बात कही है उससे सरकार के खिलाफ तानाशाही और संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन करने का जो आरोप लगाया जा रहा था वह पूरी तरह से निराधार और बेबुनियाद साबित हो। गया है। अदालत ने सरकार की मंशा के साथ सहमति भी जताई है और जिस तरह की एसआईटी से मामले की जांच कराने की योजना बनाई गई। थी उसे भी स्वीकार कर लिया है। वित्तमंत्री अरूण जेटली ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि सरकार ना तो सीबीआई के निदेशक पर लग रहे आरोपों। की जांच कर सकती है और ना ही ऐसा करने की उसकी कोई मंशा है।। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश पटनायक की निगरानी में सीवीसी के द्वारा दो सप्ताह में मामले की पूरी व त्वरित जांच कराने का जो निर्देश दिया है वह एक तरह से निष्पक्ष एसआईटी जांच के फार्मूले को अमली। जामा पहनाने जैसा ही है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दो सप्ताह के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिये जाने और सीबीआई के कार्यवाहक निदेशक नागेश्वर राव को कोई भी नीतिगत फैसला नहीं लेने का आदेश दिये जाने को गिनाकर विरोधी खेमे की ओर से यह प्रचारित करने की कोशिश अवश्य की जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के हाथ बांध दिये हैं। लेकिन सच पूछा जाये तो इन फैसलों से भी सरकार के पक्ष को ही मजबूती मिली है क्योंकि अव्वल तो सुप्रीम कोर्ट केवल दस दिन में मामले की जांच करने की बात कह रहा था जबकि सीवीसी की ओर से इस काम के लिये तीन सप्ताह का वक्त मांगा गया। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा लचीला रूख दिखाते हुए दो सप्ताह का वक्त मुकर्रर कर दिया जाना भी सरकार की बात से अदालत की सहमति के नजरिये से देखा जाना ही उचित होगा। इसके अलावा कार्यवाहक निदेशक को नीतिगत फैसला लेने  से रोके जाने के आदेश को भी देखें तो यह कोई अलग व्यवस्था नहीं दी गई है क्योंकि किसी भी पद के कार्यवाहक को नीतिगत या कोई बड़ा फैसला लेने की छूट कभी नहीं रही है। यह नैतिकता का भी तकाजा रहता है कि व्यवस्था के संचालन के लिये असाधारण परिस्थिति में कार्यवाहक नियुक्त किये जाने वाले को सिर्फ इतनी जिम्मेवारी ही संभालनी होती है। ताकि सामान्य कामकाज में कोई बाधा ना आए। अगर सुप्रीम कोर्ट सरकार से सहमत नहीं होती तो उसके समक्ष तमाम विकल्प खुले हुए थे जिससे बड़ी ही आसानी से सरकार की किरकिरी हो सकती थी। वैसे भी सीबीआई निदेशक की नियुक्ति करने या उसे पद से हटाने का जो प्रावधान है उसके तहत सरकार इस पद पर बैठे व्यक्ति पर कतई हाथ नहीं डाल सकती है। लिहाजा छुट्टी पर भेजे जाने को सर्वोच्च न्यायालय सरकार की दंडात्मक कार्रवाई के नजरिये से भी देख सकता था। इसी प्रकार वर्मा और अस्थाना को हटाकर नागेश्वर राव को कार्यवाहक बनाये जाने पर भी प्रश्न चिन्ह लगाने का विकल्प न्यायालय के पास खुला था। यहां तक कि वर्मा और अस्थाना को छुट्टी पर भेजे जाने के बाद बड़े मामलों की जांच कर रहे अधिकारियों का थोक के भाव में तबादला किये जाने के फैसले की भी विवेचना की जा सकती थी। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता और सरकार की विकल्पहीनता के अलावा सीबीआई की साख को बरकरार रखने के लिये ऐसे किसी भी मसले पर ध्यान देना भी जरूरी नहीं समझा और महज आधे घंटे की सनवाई में ही अस्थाना की याचिका को आगे के लिये टालने के अलावा वर्मा की याचिका को भी मौजूदा यथास्थिति बरकरार रखे जाने का निदेश देकर काफी हद तक दो हफ्तों के लिये टाल ही दिया है। निश्चित ही यह सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक कदम है और असाधारण मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने बेहद सामान्य तरीके और शांत सोच के साथ मामले को बिगड़ने से बचा लिया |है। ऐसे में अब आवश्यकता है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान और एहतराम किया जाए और जांच रिपोर्ट आने का इंतजार किया जाए। लेकिन पूरे मामले का राजनीतिक लाभ लेने के लिये जिस तरह से कांग्रेस की अगुवाई में पूरे देश में आज विरोध प्रदर्शन किया गया और यह बताने की कोशिश की गई कि राफेल मामले की हकीकत पर पर्दा डालने के लिये ही वर्मा-अस्थाना को बलि का बकरा बनाया जा रहा है वह निहायत ही गैर-जिम्मेवाराना कदम कहा जाएगा जिसका अभी कोई औचित्य ही नहीं था। वैसे भी राफेल खरीद के मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपनी ओर से व्यवस्था दे चुका है कि इसकी जांच कराने की कोई जरूरत ही नहीं है। वैसे भी सीबीआई को इस मामले की जांच किसी ने नहीं सौंपी है। ऐसे में बेवजह राफेल के मामले को विवादास्पद बनाने और सरकार की छवि खराब करने के लिये इसे सीबीआई के ताजा विवाद से जोड़ने की जो पहल की जा रही है इसे पूरी तरह राजनीतिक कदम ही कहा जाएगा जिसका कोई भी आधार होता तो निश्चित ही इसे अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने में कतई देरी नहीं की जाती। लेकिन बिना आग के ही धुंए का गुबार खड़ा करने की इस कोशिश की अदालत से सामने जिक्र भी नहीं करना यह बताने के लिये काफी है कि वाकई विपक्ष के पास आम लोगों से जुड़े मसलों का अकाल हो गया है जिसके कारण उसे सरकार को घेरने के लिये हवाई मुद्दे गढ़ने पड़ रहे हैं।