हाशिये पर स्वास्थ्य समस्याएं

 समाज को किसी भी सरकार से मुख्य तौर पर जिन क्षेत्रों में सुविधाओं की दरकार होती है उनमें स्वास्थ्य भी है। लेकिन विडंबना की बात है कि आजादी के 70 साल बाद भी स्वास्थ्य सुविधाओं में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया हो पाया है। हालांकि समाज के रईस व रसूखदार तबके के लिये पांच सितारा  व सात सितारा  स्तर के विश्वस्तरीय अस्पताल अवश्य खुल गए हैं लेकिन वहां आम लोगों के लिये कोई जगह नहीं है। दूसरी ओर से सरकार के स्तर पर जितनी सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं वह ना सिर्फ नाकाफी है बल्कि काफी हद तक चिढ़ाने वाली ही है। सरकारी अस्पतालों में समुचित इलाज की सुविधा उन्हें ही मिल पाती है जिनके पास किसी नेता या अधिकारी की पैरवी रहती है वर्ना आम लोगों को मिलता है तो सिर्फ धक्का और तारीख पर तारीख। छोटी-छोटी जांच सुविधाओं के लिये भी किस हद तक लोगों को धक्के खाने पड़ते हैं और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों, अधिकारियों और डॉक्टरों की झिड़की व दुत्कार झेलनी पड़ती है यह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य से पूरा स्वास्थ्य महकमा भी राम भरोसे चल रहा है और आम लोग भी अपनी स्वास्थ्य को लेकर सजग नहीं हैं। वर्ना अगर आम लोग सजग होते तो देश की राजधानी दिल्ली के 94 फीसदी परिवार बिना किसी स्वास्थ्य बीमा के ही निश्चितता का जीवन नहीं जी रहे होते। वह भी तब जबकि आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली के 71 फीसदी लोग अस्पताल, चिकित्सा, जांच और दवाओं पर अपने परिवार के आय का दस फीसदी हिस्सा खर्च कर रहे हैं। यह आंकड़ा सामने आया है प्रजा फाउंडेशन द्वारा दिल्ली के लोगों की स्वास्थ्य से जुड़े मामलों पर किये गए गहन रिसर्च के बाद तैयार किये गये श्वेत पत्र में। रिपोर्ट की मानें तो दिल्ली के लोग सालाना प्रति-परिवार तकरीबन एक लाख रूपयास्वास्थ्य पर खर्च कर रहे हैं। निश्चित ही यह बहुत बड़ी रकम है जो कि कहां जा रही है और कौन इसे हजम कर रहा है इसका कोई अता-पता नहीं है। हालिया दिनों तक तो यह भी पता नहीं चल पाता था कि दवा कंपनियां किस कदर लोगों को लट रही हैं। इसकी जानकारी तब सामने आई जब केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री जन औषधी योजना के तहत दवा बिक्री के केन्द्र खोले। वहां भी सरकार बिना सब्सिडी के ही केवल लागत मूल्य पर दवा उपलब्ध करा रही है जहां हर दवाई कम से कम तीस फीसदी और अधिकतम नब्बे फीसदी तक सस्ती मिलती है। जाहिर है कि इन केन्द्रों में मिलने वाली दवा की कीमत और खुले बाजार में उसी दवा की कीमत के बीच का जो अंतर है वह दवा कंपनियों का मुनाफा बन जाता है। यानि अब तक दवा के मामले में तमाम सरकारों ने निजी कंपनियों को खुली। लूट की छूट ही दी हुई है। इससे भी चैंकाने वाली बात यह सामने आई है। कि बीमारी के आंकड़े सार्वजनिक करने में भी काफी घपलेबाजी और गोलमाल किया जा रहा है। मिसाल के तौर पर सरकार की ओर से सूचना के कानून के तहत उपलब्ध कराई गई जानकारी की मानें तो दिल्ली में बीते एक साल में मलेरिया के केवल 4,205 मामले ही सामने आए हैं जबकि घरेलू सर्वेक्षणों से पता चला कि मलेरिया के मरीजों की तादाद 1,26,334 रही। इसी प्रकार डेंगू के मरीजों के आंकड़ों में भी किस कदर गोलमाल किया जा रहा है इसका सहज अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में डेंगू के केवल 7,153 मामले ही सामने आए जबकि घरेलू सर्वेक्षणों से इस बात की तस्दीक हो चुकी है कि सरकारी आंकड़े पूरी तरह फर्जी हैं और वास्तव में बीते एक साल में दिल्ली के 1,06,456 लोगों को डेंगू से जूझना पड़ा। ये महज एक उदाहरण ही है कि सरकार ना तो लोगों को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध करा पा रही है और ना ही इसको लेकर वह कहीं से भी गंभीर दिख रही है। बल्कि अपने आप को साफ सुथरा दिखाने के लिये आंकड़े ही दबा दिये जा रहे हैं ताकि किसी को असंतोष जताने की वजह ही ना मिले। पारदर्शिता के साथ लोगों की सेवा करने का वायदा करके दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने वाली सरकार कितनी इमानदारी से अपने फर्ज को निभा रही है इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि अधिकांश विधायकों ने विधानसभा में सरकार से स्वास्थ्य संबंधी कोई सवाल पूछना भी जरूरी नहीं समझा है। दिल्ली के तकरीबन बीस फीसदी विधायकों ने तो जनवरी 2017 से लेकर जनवरी 2018 के बीच स्वास्थ्य से जुड़ा एक भी सवाल विधानसभा में नहीं पूछा। उनके लिये लोगों का स्वास्थ्य महत्वपूर्ण होता तो इस तरह की अनदेखी वे कतई नहीं कर रहे होते। ऐसा नहीं है कि स्वास्थ्य को केवल दिल्ली सरकार ने ही हाशिये पर डाला हुआ है बल्कि सच तो यह है कि अनदेखी के मामले में दिल्ली नगर निगम भी प्रदेश सरकार के साथ कदम ताल करने में कतई पीछे नहीं है। यही वजह है कि इस साल नगर निगम के अस्पतालों और दवाखानों में चिकित्साकर्मियों की कमी तीस फीसदी रही जबकि प्रदेश सरकार द्वारा संचालित अस्पतालों में शैक्षणिक पदों में व्याख्याताओं के 67 फीसदी पद रिक्त रहे। लेकिन इन रिक्तियों को भरने के बजाय लोक-लुभावन बातें करने और हवाई घोषणाएं करने में कोई कमी नहीं देखी गई। दिल्ली सरकार के मोहल्ला क्लीनिक का जो अभियान था वह भी जड़ जमाने से पहले ही उखड़ता दिख रहा है वर्ना दिल्ली के लोगों को स्वास्थ्य के क्षेत्र में औसतन प्रति परिवार सालाना एक लाख रूपया खर्च करने के लिये मजबूर नहीं होना पड़ता। इसी प्रकार मुफ्त दवा वितरण की जो योजना केन्द्र व राज्य द्वारा बड़े अस्पतालों में संचालित हो रही है वह भी लोगों को उतनी राहत नहीं दे पा रही है जितना इसका ढिढोरा पीटा जा रहा है। वजह है दवा वितरण के लिये समुचित स्टाफ का ना होना और बेतहाशा भीड़ के बीच गिने-चुने लोगों को ही दवा देकर अपने कर्तव्य ही इति कर लेना। यही हाल एम्स सरीखे केन्द्र के अस्पताल का भी है और लोकनायक सरीखे प्रदेश के अस्पताल का भी। अगर आम लोगों को स्वास्थ्य के प्रति भी सरकार निश्चिंत नहीं कर सकती तो निश्चित ही यह उसके लिये शर्म से डूब मरने वाली बात है। वह भी तब जबकि प्रत्यक्ष व परोक्ष तौर पर हर किसी की प्रति सौ रूपये की कमाई में से तकरीबन 35 फीसदी से भी अधिक हिस्सा किसी ना किसी टैक्स या सरकारी शुल्क की भेंट चढ़ जाता हो।