साइबर ठगी से परेशान हैं इंदिरापुरम थाना क्षेत्र के लोग

साहिबाबाद। स्थानीय इंदिरापुरम थाना क्षेत्र में हाल के दिनों में साइबर ठगी के कई मामले सामने आ चुके हैं, लेकिन पुलिस साइबर सेल के हाथ अब भी अपराधियों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है, जनपद पुलिस कप्तान उपेंद्र अग्रवाल को इस ओर ध्यान देना चाहिए। हद तो यह कि ऐसे मामलों में स्थानीय पुलिस चौकी के पुलिस कर्मियों का रवैया भी असहयोगात्मक ही रहता है जिससे पीड़ितों को ऑनलाइन एफआईआर करवानी पड़ती है।लेकिन सवाल उठता है कि क्या सभी पीड़ित सुशिक्षित हैं और ऐसा करने में सक्षम हैं? तो जवाब होगा नहीं! स्वाभाविक है कि ऐसा करने से भले ही ऐसे गम्भीर आर्थिक अपराध के मामलों में एफआईआर की संख्या थाना क्षेत्र में कम दर्ज हों, लेकिन ऐसी घटनाओं में कमी आ रही हो, ऐसा नहीं लगता। पिछले दिनों वैशाली सेक्टर 6 निवासी वरिष्ठ पत्रकार ओंकारेश्वर पांडे के साथ घटित ऑनलाइन ठगी की घटना की याद अभी धुंधली भी नहीं हुई कि ताजा मामला इंदिरापुरम नीतिखण्ड एक निवासी अमितेश कुमार सिंह का प्रकाश में आया है जो लगभग 50 हजार रुपये की एटीएम धोखाधड़ी के शिकार हुए हैं। दोनों मामलों में पुलिस पर यही आरोप है कि उसने सम्बन्धित घटना की एफआईआर ही दर्ज नहीं की। खैर, ओंकारेश्वर पांडे के आवेदन को तो पुलिस ने अपने पास रख लिया, लेकिन अमितेश कुमार सिंह को तो बैरंग लौटा दिया गया।इस सम्बंध में अमितेश कुमार सिंह ने बताया कि जब उनके एफआईआर आवेदन पत्र को सम्बन्धित पुलिस चौकी और थाने में नहीं ली गई तो थक हार कर उन्होंने ऑनलाइन एफआईआर का सहारा लिया जिसकी शिकायत संख्या 31681037071800532, थाना इंदिरापुरम दिनांक 22/11/2018 है। लेकिन सप्ताह भर बाद भी उनकी समस्याअों का समाधान न तो पुलिस कर पाई है और न ही सम्बन्धित बैंक। सभी लोग एक दूसरे पर बात फेंक रहे हैं, जबकि मामला 50 हजार रुपए के अनऑथराइज्ड एटीएम विथद्रावल से जुड़ा है। ऐसे एक नहीं कई मामले गुजशते वक्त में सामने आ चुके हैं, लेकिन कार्रवाई के मामले में पुलिस के हाथ खाली हैं।स्वाभाविक है कि एनसीआर का पॉश इलाका इंदिरापुरम के एटीएम सेंटर भी जब एटीएम कार्ड क्लोन करके फर्जी निकासी करने वाले गिरोह की जद से दूर नहीं हैं तो अन्य जगहों की क्या हालत होगी, समझा जा सकता है। लेकिन हैरत की बात है कि ऐसे गिरोह तक पुलिस साइबर सेल के हाथ भी अबतक नहीं पहुंच पा रहे हैं। जबकि आये दिन मीडिया माध्यमों में ऐसी घटनाएं दिखाई-सुनाई तो पड़ती हैं,  लेकिन ठोस कार्रवाई नदारत। शायद इसलिए कि सम्बन्धित पुलिस कर्मियों को और अधिक प्रशिक्षण की जरूरत है।