सरदार की प्रतिमा भारत के स्वाभिमान और गौरव की ऊँचाई का अभिमान

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल की विश्व में सबसे ऊंची प्रतिमा का अनावरण कर एक अद्भुत कीर्तिमान स्थापित किया। राष्ट्र के लिए विभिन्न लोगों ने जो कार्य किए, अपना जीवन अर्पित किया उसे चाहे किसी भी सत्ता द्वारा दबाने और ढकने का प्रयास किए जायें लेकिन वक्त की हवा सच्चाई के दर्पण पर पड़ी सत्ता की मिट्टी उड़ा ही देती है और तब सच्चाई सामने आती है। सरदार पटेल की विश्व में सबसे ऊंची मूर्ति वस्तुत- भारत के स्वाभिमान और गौरव की ऊँचाई का अमर अभिमान बनी है। लेकिन मैं समझता हूं ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जिसने जीवन में लोभ, लालच और स्वार्थ से परे हटकर देश और समाज के लिए छोटा- बड़ा जैसा भी काम किया हो वह हमारे मध्य सरदार ही हैं। जिन लोगों ने समाज को बिखरने से बचाया, राष्ट्र की अस्मिता और विरासत को विदेशी आक्रमणों से बचाने के लिये जीवन अर्पित कर दिया, ऐसे हजारों लोग हुये जो राजनीति में तो नहीं रहे लेकिन राजनीति में रहने वाले लोगों से कहीं ज्यादा बड़े दीर्घकालिक महत्व के कार्य कर गये। वे किसी सरदार से कम नहीं। उदाहरण के लिए एकनाथ रानाडे। उन्होंने विवेकानन्द केंद्र स्थापित किया, कन्याकमारी में श्रीपाद शिला पर स्वामी विवेकानन्द का भव्य स्मारक स्थापित किया और उनके जीवन की एकात्मता का यह असाधारण पहलू था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अंत्यत वरिष्ठ प्रचारक होते हुये भी उनके इस महान कार्य में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और द्रमुक नेता श्री करुणानिधि ने भी भरपूर सहयोग दिया। यह है राष्ट्रीय एकात्मता का भाव जो सरदार पटेल के जीवन से भी प्रकट होता है क्योंकि ना केवल उन्होंने सैकड़ों रियासतों को इकट्ठा कर भारत की एकता मजबूत की बल्कि कांग्रेस कार्य समिति में प्रस्ताव भी रखा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकताओं को कांग्रेस का सदस्य बनने की अनुमति दी जानी चाहिए। श्री लाल बहादुर शास्त्री का जीवन भी ऐसा ही था जब उन्होंने 1965 के युद्ध के समय यातायात व्यवस्था हेतु संघ के स्वयंसेवकों की मदद ली थी ताकि यातायात पुलिस युद्धकालीन सेवाओं हेतु तैनात की जा सके। हमारे मध्य ऐसे अनेक सरदार मिलते हैं जो हमारे जीवन को सुरक्षित और भविष्य को आनन्दमय बनाने के लिये अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ अर्पित करते हैं लेकिन हम शायद कभी उनके नाम भी नहीं जान पाते। आज मुझे ऐसे ही एक वायुयोद्धा एयरमार्शल हेमन्त नारायण भागवत् से मिलने का सौभाग्य मिला जो 60 वर्ष की आयु पूरे होने पर आज ही अवकाश ग्रहण कर रहे थे। उन्होंने 38 वर्ष वायुसेना के माध्यम से देश की सेवा की और जब 60 वर्ष के पूरे हो गये तो अभी कुछ दिन पहले शायद 24 अक्टूबर को उन्होंने अपने जीवन की दो हजारवीं फी फाल यानी बीसियों किलोमीटर की ऊँचाई से पत्थर की तरह नीचे छलांग मारी और जमीन के निकट आने पर ही पैराशूट खोला ताकि दुश्मन को पैराशूट देखकर वायुवीरों के नीचे आने का आभास न हो। यह बहुत खतरनाक और सामान्य व्यक्ति के लिए प्राण कंपा देने वाला युद्ध कार्य होता है। इसके प्रशिक्षण के लिये ही एयरमार्शल हेमन्त नारायण भागवत् जाने जाते थे। कारण यह है कि प्राय- 20 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे विमान या हेलीकॉप्टर से वायुसैनिक पैराशूट बिना खोले पृथ्वी की ओर छलांग लगाते हैं तो उस ऊँचाई से जमीन तक तापमान में -30 डिग्री (या 30) से लेकर जमीन के वातावरण के निकट की गर्मी के तापमान तक के अंतर को वायुवीर को कुछ ही क्षणों में झेलना पड़ता है। इतना ही नहीं यदि विमान से पृथ्वी तक की सीधी दूरी 20 किलोमीटर है तो छलांग मारने के बाद हवा के बहाव और दिशा के अनुसार छलांग मारने वाले वायुवीर को अक्सर 40 या 50 किलोमीटर की हवा में तैरते हुये । दूरी तय करनी पड़ जाती है। तब जमीन निकट देखने पर ही वे पैराशूट खोलते हैं। एयरमार्शल भागवत् । अवकाशग्रहण करने वाले दिन प्रसन्न थे क्योंकि उन्होंने वायुयोद्धा के नाते एक संतोषजनक और गौरवशाली जीवन जिया। वे महाराष्ट्र में रत्नागिरी के अत्यंत सुंदर पश्चिमी सागर तटीय क्षेत्र के निवासी हैं। संपूर्ण परिवार में वे पहले वायुसैनिक कहे जायेंगे लेकिन उनके जीवन में एक और अति गौरवशाली कथा है- उनके पर्वज । 18वीं शताब्दी के अंत में उन महान बाजीराव पेशवा की फौज में पुजारी थे। जिस फौज ने 1758 में सिंधु के तट पर अटक के किले के पास दुर्रानी की फौजों को हरा कर किले पर भगवा झंडा लहराया था और विजय प्राप्त की थी। तभी से मुहावरा चल पड़ा था कि अटक से कटक तक भगवा लहराता है। और रोचक बात यह है कि शायद विमान की यात्रा वाले भी वे अपने परिवार में पहले नहीं हैं। 100 साल पहले जब देश में विमान सेवा प्रारम्भ हुई तो उनके पिता के दादादादी जुहू के पास बने छोटे विमान तल पर गये और उस समय विमान यात्रा की छोटी उड़ान के लिए लगने वाले किराये यानी प्रति यात्री 5 रुपये देकर यात्रा की। एयरमार्शल भागवत् का जीवन उन हजारों सैनिकों के जीवन को और जानने की उत्कंठा और प्रेरणा देता है । जो देश सेवा का एक सपना लेकर फौज में आते हैं। और उसके कठोर अनुशासन के कारण अपने 38-40 साल के सेवाकाल में न अपने नाते रिश्तेदारों से मिलने का समय पाते हैं, न निकटवर्ती मित्रों -रिश्तेदारों की शादियों या सुख-दुख में शामिल हो पाते हैं। उनका अपना जीवन भी लगातार तबादलों और नये स्थानों पर नियुक्तियों के बीच गुजरता रहता है। ये हमारे महापुरुष हैं जो चाहे वायुसेना में हों या नौसेना में अथवा थल सेना में, इनमें से हर सैनिक मुझे सरदार का ही दर्शन कराता है।