विपक्षी एकता का अंतिम प्रयास

 मौजूदा राजनीतिक हालातों में यह बात तो सर्वविदित है कि अकेला चना कतई भाड़ नहीं फोड़ सकता है। लिहाजा सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय दलों के साथ मजबूत गठजोड़ करना जितना आवश्यक भाजपा के लिये है उससे कतई कम कांग्रेस के लिये भी नहीं है। सत्ता में दोबारा वापसी करने की कोशिशों के तहत भाजपा ने तो अपने बराबर सीटें देने का वायदा करके जदयू को भी मजबूती से साध लिया है और मह्मराष्ट्र में शिवसेना को भी मनानेसमझाने की पुरजोर कोशिशें अंतिम व सकरात्मक दौर में से हैं। इसके अलावा बाकी सूबों में भी विकासपरक व राष्ट्रवादी सोच रखनेवाले छोटे-बड़े दलों को अपने साथ मजबूती से जोड़े रखने के लिये हर मुमकिन समझौता करने की भी सैद्धांतिक तौर पर बनाई गई रणनीति को जोर-शोर से अमली जामा पहनाया जा रहा है। लेकिन विपक्षी खेमे की ओर नजर दौड़ाएं तो वहां की स्थिति ऐसी है कि जहां से चले वहीं आकर रूके। विपक्षी गठजोड़ बनाने की कोशिशें तो बीते साढ़े चार सालों में कई बार व कई स्तरों पर हुई । कभी कांग्रेस को आगे रखकर राष्ट्रव्यापी गठजोड़ बनाने की कोशिश की गई तो कभी समाजवादी ताकतों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया गया। कभी ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों को एक सूत्र में बांधने की कोशिश की तो कभी लालू प्रसाद यादव ने। यहां तक कि कर्नाटक विधानसभा के चुनावों का नतीजा सामने आने के बाद जदएस की सरकार के शपथ ग्रहण में विपक्षी दलों ने अपनी एकजुटता का मुजाहिरा करने में भी कोई कसर नहीं छोड़े। लेकिन वे तमाम कोशिशें जिस ऊर्जा व जोर-शोर से आरंभ हुई उतनी ही तेजी के साथ जमींदोज भी हो गई। किसी भी प्रयास में कोई सफलता नहीं मिल पाने की सबसे बड़ी वजह रही विपक्षी दलों का अत्यधिक महात्वाकांक्षी होना और नेतृत्व की बागडोर किसी एक के हाथों में देने पर सहमति नहीं बन पाना। ऐसे में बीते दिनों कांग्रेस ने मजबूती के साथ अपनी अगुवाई में विपक्षी दलों को अपने साथ जोड़ने का अभियान चलाया और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार भी घोषित कर दिया। लेकिन राहुल के नेतृत्व को ना बाकी विपक्षी दलों ने स्वीकार किया और ना ही कांग्रेस के भीतर इस पहल को लेकर कोई उत्साह का वातावरण बन पाया। उल्टा इसका नुकसान यह हुआ कि बाकी तमाम आपसी मतभेदों को भुलाकर तमाम क्षेत्रीय दल सूबाई स्तर पर एक मंच पर आने के लिये जो सहमत हो रहे थे उसकी बुनियाद ही हिल गई और राकांपा ने प्रधानमंत्री मोदी को इमानदारी व नेकनियती का प्रमाणपत्र देकर अलग सुर-तान छेड़ दिया जबकि बसपा इस कदर बिदकी कि उसने पांच राज्यों के चुनावों में तीसरी ताकतों का अलग गठजोड़ कायम करने की रणनीति पर अमल करना आरंभ कर दिया। नतीजन कांग्रेस का उत्साह भीर ठंडा पड़ गया और उसने यथास्थिति को स्वीकार करते हुए औपचारिक तौर। पर प्रधानमंत्री पद के लिये राहुल द्वारा जताई गई दावेदारी को वापस ले लिया। झलांकि सूबाई स्तर पर भाजपा विरोधी दलों को अपने साथ जोड़ने के अभियान में कांग्रेस लगातार जुटी रही और इसी का नतीजा रहा कि बिहार का महागठजोड़ भी बदस्तूर कायम रहा और तेलंगाना के चुनाव में येडीपी के साथ उसका गठबंधन भी हुआ। लेकिन बाकी सूबों में उसने गठजोड़ कायम करने के प्रति दिखाई जा रही तत्परता को तात्कालिक तौर पर ठंडे बस्ते में डाल दिया। लेकिन कहते हैं कि जहां कोई रिक्ति होती है उस जगह को प्रकृति खुद ही भर देती है। वैसे भी चाहत तो बरकरार ही है सभी भाजपा विरोधी दलों के भीतर कि राष्ट्रय स्तर पर एक मजबूत महागठजोड़ कायम हो ताकि वोटों के बिखराव को रोक कर भाजपा को दोबारा सत्ता हथियाने का मौका ना दिया जाए। लिहाजा जाँ हो वहां राह निकल ही आती है। ऐसे में इस बार राह निकालने की पहल आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री व तेदेपा सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू ने की है। तेलंगाना में कांग्रेस के साथ चुनावी गठजोड़ करने के बाद नायडू ने राहुल गांधी से मुलाकात करके विपक्षी एकता की नयी आधारशिला रखने की जो कोशिशें शुरू की हैं उसीका नतीजा है कि तमाम भाजपा विरोधी पार्टियां इस बात पर सहमत हूं हैं कि एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाकर उसके आधार पर महागठबंधन तैयार करने की रूपरेखा बनाई जाए। इसके लिये राकांपा सुप्रीमो शरद पवार ने भी अपनी सहमति दे दी है और नेशनल कांफ्रेंस के वरिष्ठतम नेता उमर अब्दुल्ला भी इसके लिये तैयार दिख रहे हैं। यह फार्मूला दक्षिणी राज्यों में भी कारगर रहेगा और कर्नाटक सरीखे ऐसे सूबे में भी जहां कांग्रेस के समर्थन से सकार चला रही जेडीएस ने बीते दिनों लोकसभा चुनाव में अपने दम पर किस्मत आजमाने की बात कही थी। लेकिन मसला है कि साझा न्यूनतम कार्यक्रम बनाने के लिये पहले विपक्षी दलों को साझा मंच पर आना होगा और साझा मुद्दे तय करने होंगे। अव्वल तो सभी विपक्षियों को एक मंच पर लाना ही तराजू पर मेंढ़क तौलने सरीखा दुरूह काम है। लेकिन महागठबंधन बनाने की साझा मजबूरी के कारण अगर मुख्य विपक्षी पार्टियां एक साथ आ भी गई तो साझा चुनावी मुद्दा तय करने में पसीना आना तय है। क्योंकि कांग्रेस ने जिस राफेल खरीद को तल देकर चैकीदार को। चोर बताने की पहल की है उस मामले में शरद पवार साफ कर चुके हैं कि प्रधानमंत्री मोदी की नीयत पर कतई शक नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार कांग्रेस द्वारा जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बताया जाना और नोटबंदी को सदी का सबसे बड़ा घोटाला करार दिया जाना येडपी सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडूको कतई रास नहीं आ सकता है। इसके अलावा अभी अन्य कोई ऐसा बड़ा मुद्दा सामने भी नहीं है जिसके आधार पर रात्रेय स्तर पर भाजपा की घेराबंदी की जा सके। खैर, अगर चुनावी मुद्दे के मामले में सबको अपनी फली पर अपना मनचाहा राग आलापने की छूट मिल भी गई तो असली पेंच नेतृत्व को लेकर फंसना तय ही है। कोई भी दल कांग्रेस को मजबूत करने के लिये अपने हितों को पीछे खना कतई गवारा नहीं कर सकता है। उल्टा सबकी कोशिश होगी कि कांग्रेस को कम से कम सीटें देकर अधिकतम सीटों पर खुद से कब्जा जमाया जाए ताकि अगर गैरभाजपाई ताकतों की सकार बनने की नौबत आए तो कांग्रेस को प्रधानमंत्री पर पर दावेदारी करने की मजबूती हासिल ना रहे। खैर, अभी तो विपक्षी एका कायम करने की एक नयी शुरूआत ही हुई है जिसकी राहों में फूल कम और कांटे ही अधिक दिखाई पड़ रहे हैं। लेकिन लोकसभा चुनाव की नजदीकियों को देखते हुए इतना तो स्पष्ट है कि यह अंतिम कोशिश ही है विपक्षी दलों को एक सूत्र में पिरोने की। अगर यह अभियान कामयाब नहीं हुआ तो अब ना वक्त। बचेगा और ना ही किसी में इतना जोश-जुनून रहेगा कि वह भाजपा को रोकने के लिये राष्ट्रय स्तर पर मजबूत घेराबंदी के किसी नए फार्मूले को आगे कर सके।