चोर मचाए शोर?









राफेल विमान खरीद के मसले पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला सामने आ जाने के बाद भी यह विवाद थमता नहीं दिख रहा है। बेशक सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर यह बता दिया हो कि राफेल की खरीद में पूरी तरह से नीतिगत प्रक्रिया का पालन किया गया, मौजूदा वक्त की सबसे बेहतरीन तकनीक से युक्त विमान के तौर पर इसका चयन किया गया और ऑफसेट पार्टनर के रूप में रिलायंस के चयन को भी सर्वोच्च न्यायालय ने उचित बताया है। यानि अपनी ओर से तो सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले की सुनवाई करके राफेल खरीद के मामले में मोदी सरकार को पूरी तरह क्लीन चिट दे दी है और राफेल सौदे से जुड़े तमाम याचिकाओं को एक साथ ही निपटाकर मामले पर पूर्ण विराम लगा दिया है। लेकिन मसला है कि इतने दिनों से राफेल के मसले को कांग्रेस ने इतना तूल दिया हुआ था कि अब एक झटके में उसके लिये यह स्वीकार करना बेहद असहज हो रहा है इसमें उसका स्टैंड गलत था। यही वह मसला था जिसे आगे रख कर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने देश भर में यह नारा लगाया कि चैकीदार चोर है। इस नारे का उन्हें फायदा भी मिला और पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में उन्होंने तीन भाजपा शासित राज्यों की सत्ता पर कब्जा कर लिया। लेकिन सवाल है कि अब जबकि पूरे मामले का दूध-पानी अलग हो गया है तब भी वे जिस तरह से इस मामले में सरकार को चोर और भ्रष्ट साबित करने में जुटे हुए हैं उसे पूर्वाग्रह से प्रेरित राजनीति का नाम ना दें तो और क्या कहें। हालांकि इस मामले को तूल देने के क्रम में कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ झूठे व मनगढ़ंत इल्जामों का जो पुलिंदा लहराने की कोशिश की थी उसमें उसे कदम कदम पर अपने झूठ व फरेब के किले को बचाए रखने में काफी जद्दोजहद का सामना करना पड़ा। जब राहुल ने संसद में यह बताया कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने उन्हें व्यक्तिगत तौर पर बताया है राफेल सौदे में गोपनीयता का कोई प्रावधान नहीं है तब उनकी बात का खंडन फ्रांस की सरकार ने भी किया और भारत की रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने भी ठोस सबूतों के साथ यह बात सामने रखी कि गोपनीयता का करार फ्रांस सरकार के साथ कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में ही हो गया था और उस करार पर तत्कालीन रक्षामंत्री एके एंटनी ने ही दस्तखत किया था। लेकिन फ्रांस सरकार से लेकर रक्षामंत्री तक की दलील को राहुल ने नहीं माना और संसद से लेकर सड़क तक यह दोहराते रहे कि चैकीदार चोर है। जब हमारे सेना प्रमुख ने राफेल की तकनीक को आधुनिकतम व बेजोड़ बताते हुए कहा कि इसके आने से देश के फौज की ताकत में अभूतपूर्व इजाफा होगा तब भी राहुल ने इस दलील को अनसुना कर दिया। यहां तक फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति तक ने यह कह दिया कि इस मामले में कोई गड़बड़झाला नहीं है तब भी राहुल ने बात सुनने की कोशिश नहीं की और अपने मनगढ़ंत दलीलों व कुतर्कों पर अड़े रहे। इसके अलावा राफेल की निर्माता कंपनी ने सीईओ ने कहा कि रिलायंस का चयन उन्होंने स्वेच्छा से किया है क्योंकि एचएएल ने तय समय के भीतर उत्पादन आरंभ करने से हाथ खड़ा कर दिया और उन्होंने मोदी सरकार द्वारा अदा किये गये मूल्य को संप्रग सरकार द्वारा तय करने की कोशिश किये जा रहे मूल्य से भी तकरीबन दस फीसदी कम बताया तब राहुल की अगुवाई में कांग्रेस उन पर ही हमलावर हो गयी और उन्हें चोरी में साझेदार बताने का प्रयास किया जाने लगा। यहां तक कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सीलबंद लिफाफे में राफेल की खरीद के एवज में तय हुई रकम के बारे में भी जानकारी जमा करा दी तब भी राहुल ने चैकीदार चोर है का नारा बुलंद करने से परहेज नहीं बरता। और अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले का निपटारा करते हुए सरकार को क्लीन चिट दे दी है तब भी ना तो वे न्याय की बात सुनने के लिये तैयार हैं और ना ही उनकी पार्टी। वह भी तब जबकि इस मामले में अब कोई भी राजनीतिक दल उनके साथ खड़ा नहीं दिख रहा है और शरद पवार तो पहले ही यह कह चुके हैं कि प्रधानमंत्री मोदी पर हजार तरह के इल्जाम लगाये जा सकते हैं लेकिन उनकी नीयत पर कतई शक नहीं किया जा सकता है। लेकिन राहुल हैं कि मानते ही नहीं। वे माने भी क्यों? वह भी तब जबकि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में एक त्रुटि आ गयी है कि सरकार ने अपने जवाब में कोर्ट को यह बताया कि कीमत के बारे में कैग को भी सरकार बता चुकी है और कैग के बाद पीएसी भी इसकी जांच करेगी। लेकिन अदालत के फैसले में यह लिखा आ गया है कि सीएजी ने जांच करके फाइल पीएसी को दे दी है। दरअसल सरकार ने अदालत को प्रक्रिया बताई थी जिसके बारे में अदालत को गलतफहमी हो गयी कि प्रक्रिया का पालन हो चुका है। इस त्रुटि को दूर कराने के लिये सरकार ने अदालत में मामला पेश भी कर दिया है लेकिन कांग्रेस इसी त्रुटि को आधार बनाकर यह ढ़ोल बजाने में जुटी है कि निश्चित ही इस खरीद में धांधली हुई है। ऐसे में सवाल है कि जनता को भरमाने और बरगलाने का प्रयास आखिर क्यों हो रहा है। वह भी तब जबकि राहुल खुद ही भ्रष्टाचार के मुकदमे में जमानत अदा करके आजाद हवा में सांस ले रहे हैं और मामले की सुनवाई लगातार चल रही है। इसके अलावा उनकी मां और जीजा के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के मामले में चल रहे हैं। ऐसे में अगर वे अपनी कालिख को छिपाने और दूसरों पर कीचड़ उछाल कर जनता को यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि इस हम्माम में सभी गंदे ही हैं तो यह निश्चित ही बेहद बचकानी रणनीति है जिसका खुलासा होने में देर नहीं लगेगी। ऐसी हरकतों से उनकी विश्वसनीयता ही समाप्त हो रही है और लोगों को उनकी किसी बात पर भरोसा नहीं हो पाएगा। लिहाजा बेहतर होगा कि अगर गलती हो गई है तो उसे स्वीकार करके आगे बढ़ा जाये और भविष्य में बिना तथ्यों की जांच किये किसी मसले को बड़े मुद्दे के तौर पर आगे ना बढ़ाया जाए वर्ना फजीहत उनकी ही होगी।