लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देनजर महागठबंधन को लेकर संशय बरकरार



गाजियाबाद। हाल ही में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुए विधानसभा चुनावों  में जिस तरह कांग्रेस पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए सूबाई सत्ता में वापसी की है, उससे आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर जनपद में एक बार फिर से महागठबंधन को हवा दे दी है। जिसका पूरा दारोमदार देश की सियासत में कांग्रेस की पुनः बढ़ती सियासी हैसियत के अनुरूप ही उत्तरप्रदेश में भी पार्टी में फिर से नई जान फूंकने के मद्देनजर पार्टी नेतृत्व द्वारा लिए गए दूरदर्शितापूर्ण फैसलों पर निर्भर करेगा। क्योंकि कांग्रेस आलाकमान यदि सपा-बसपा के समक्ष सीट बंटवारे में समुचित
हिस्सेदारी लेने के बजाय यदि पूर्व जैसे घुटने टेक देगा तो इसका खामियाजा पार्टी के राज्यव्यापी प्रदर्शन के साथ-साथ गाजियाबाद पर भी पड़ेगा यही वजह है कि जनपद के कांग्रेसी जो सूबाई राजनीति में भी दखल रखते हैं,अंतर्मन से चाहते हैं कि तेलंगाना में टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू के साथ जाने के बावजूद भी जिस तरह से कांग्रेस वहां पर सूबाई सत्ता की प्राप्ति के लिए हाथ मलती रह गई, कांग्रेस नेतृत्व उससे सबक ले, क्योंकि
कमोबेश यूपी-बिहार की सियासत में भी थके-हारे दागी नेताओं और उनकी पार्टियों के साथ खड़े होने का खामियाजा संभवतया कांग्रेस को भी भुगतना पड़ सकता है। नाम नहीं छापे जाने की शर्त पर ऐसे नेताओं ने याद दिलाया है कि अब भले ही तीन राज्यों में कांग्रेस को पुनः मिली बढ़त के बाद सपा-बसपा नेतृत्व कांग्रेस के युवा नेतृत्व के प्रति पिघले, लेकिन अतीत के तल्ख अनुभवों के आधार पर ही पार्टी कोई समझदारी भरे फैसले ले, तभी कांग्रेस और कांग्रेसियों का हित सधेगा, अन्यथा नहीं।दरअसल, कांग्रेसियों को आशंका है कि कांग्रेस की मदद से जैसे ही सपा-बसपा
को सियासी ताकत मिलेगी, उसके बाद वो दोनों पहले एक दूसरे की और फिर कांग्रेस की सियासी जड़ खोदने से बाज नहीं आएंगे, जिससे कांग्रेस की भीबेवजह किरकिरी होगी। इसलिए महागठबंधन संबंधी कोई भी फैसले करने से पहले पार्टी नेतृत्व को बिहार में महागठबंधन के हुए हश्र को भी ध्यान में रखना चाहिए। उनके मुताबिक, यह ठीक है कि जहां जहां सपा और बसपा ने उपचुनाव में गठबंधन करके चुनाव लड़ीं, वहां वहां पर उन्होंने भाजपा खेमे में सेंध लगाकर अपने प्रत्याशी को विजयश्री दिलवाने में कामयाब रहीं, जिसमें कांग्रेस, रालोद, आप जैसी पार्टियों की सकारात्मक भूमिका महागठबंधन के पक्ष में रही। लेकिन इन तुच्छ जीत के बाद सपा और बसपा ने अन्य साथी दलों के खिलाफ कैसी उपेक्षापूर्ण हिकारतभाव गाहे बगाहे प्रदर्शित किया, वह भी किसी से छिपी हुई बात नहीं है। देखा जाए तो पहले बसपा और सपा सुप्रीमों ने लोकसभा चुनाव में भाजपा का
विजय रथ रोकने के लिए एक मंच पर साथ आने की घोषणा कर दी थी, लेकिन अब कांग्रेस के बढ़ते जनाधार को देखते हुए एक बार फिर महागठबंधन के पुनर्गठन को लेकर अंदरखाने में बात चल रही है, फिर भी कांग्रेस की स्पष्ट और सहभागी भूमिका पर संशय बरकरार है। यूं तो लोकसभा चुनाव में समय अभी है,लेकिन जिस तरह से सभी पार्टियां अपनी अपनी तैयारी में जुटी हुई हैं, उसे देखते हुए भाजपा भी फिर से जीत दर्ज करने के लिए पूरे दम खम के साथ मैदान में उतरी हुई नजर आ रही है। उधर, विपक्षी दलों ने भी लोकसभा चुनाव को लेकर महागठबंधन की घोषणा भले ही नहीं की हो, लेकिन जिस तरह से कांग्रेस,सपा और बसपा के कतिपय पदाधिकारियों का मूड़ दिख रहा है, उससे महागठबंधन होने की प्रबल उम्मीद दिख भी रही है और नहीं भी !यही वजह है कि महागठबंधन की घोषणा को लेकर लोकसभा चुनाव की तैयारी कर रहे दिग्गज नेता भी भीतर ही भीतर काफी परेशान सा दिखाई दे रहे हैं। लगभग सभी की जुबान पर एक ही शब्द सबसे ज्यादा गूंज रहा है कि आखिर किस करवट ऊंट बैठेगा? क्योंकि गाजियाबाद में कांग्रेस, सपा, बसपा, आप और रालोद में से किस पार्टी के खाते में सीट जाएगी, उसको लेकर सभी दावेदारों में संशय
बरकरार है। हालांकि, वर्तमान की बात की जाए तो सपा से सुरेन्द्र कुमार मुन्नी चुनाव लड़ने के पूरे मूड में दिखाई दे रहे है जिनका साथ महानगर
अध्यक्ष राहुल चौधरी भी खूब दे रहे है। उन्होंने तो कई बार सार्वजनिक मंचों से घोषणा भी की है कि इस बार सपा से सुरेन्द्र कुमार मुन्नी हलोकसभा चुनाव लड़ेंगे।उधर, बसपा में सुरेश बसंल अंदरखाने ही अपना माहौल बनाने में जुटे हुए हैं। लोगबाग भी मानते हैं कि सुरेश बंसल भी गठबंधन की सीट पर एक मजबूत चेहरा है, लेकिन वह भी महागठबंधन को लेकर चुपचाप ही बैठना उचित समझ रहे हैं और अंदरखाने ही अपनी गोटी बुलंद करने के वास्ते अपने समर्थकों से संपर्क कर रहे हैं। जबकि कांग्रेस में भी कई चेहरे चुनाव लड़ने के चक्कर में दिखाई दे रहे हैं, जिनमें सुरेन्द्र प्रकाश गोयल, डॉली शर्मा और अमरपाल शर्मा मुख्य तौर पर सक्रिय हैं। हालांकि सभी अभी दबी जुबान से ही यह कह रहे हैं कि हम चुनाव लड़ेंगे। जबकि इनकी पार्टियों के हाईकमान अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं। यही वजह है कि फिलवक्त कोई भी दावेदार खुलकर
सामने नहीं आया है जो भाजपा के खेमे में सेंध लगाकर अपनी पार्टी की जीत सुनिश्चित करे। हैरत की बात तो यह भी है कि अभी तक रालोद और आप पार्टी से ऐसा कोई नाम सामने निकलकर नहीं आया है, जो टिकट के लिए प्रबल दावेदार हों।स्पष्ट है कि सपा, बसपा, कांग्रेस, रालोद और आप नेता अभी महागठबंधन की बाट जोह रहे हैं और सभी पार्टी के वरिष्ठ और जुझारू नेतागण अपने शीर्ष नेतृत्व के आदेश का इंतजार कर रहे हैं। कहीं ऐसा नहीं हो कि ये इंतजार ही करते रहें और कोई बाहरी नेता पुनः यहां सियासी पैराशूट के सहारे टपक पड़े!