मालदीव पर माथापच्ची
क्षेत्रफल और आबादी के लिहाज से एशिया का सबसे छोटा और समुद्र तल से ऊंचाई के लिहाज से विश्व की सबसे निचली सतह वाला देश मालदीव इन दिनों भारत के साथ रिश्तों को लेकर काफी चर्चा में है। दरअसल भारत के लक्ष्यद्वीप के नजदीक तक फैले हिन्दमहासागर की गोद में बैठे इस द्वीपीय देश ने अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण भारत के लिये भी खुद को महत्वपूर्ण बना लिया है और समुद्र की ओर से भारत की घेराबंदी करने की योजना बना रहे चीन के लिये भी यह बेहद महत्वपूर्ण हो चला है। स्थिति यह है कि अगर यह चीन की ओर झुका तो भारत के लिये हिन्द महासागर में अपनी मजबूती को बरकरार रखना बड़ी चुनौती बन जाएगी। लिहाजा भारत का प्रयास है कि इस देश को अपनी संप्रभुता के साथ कोई समझौता ना करने दिया जाए और इसे किसी ऐसी मजबूरी में नहीं फंसने दिया जाए जिसका लाभ उठाकर चीन इसकी जमीन का मनमाना इस्तेमाल कर सके। इसी वजह से भारत ने मालदीव के साथ बेहद मित्रतापूर्ण रिश्ता कायम रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है और जरूरत पड़ने पर हमेशा बढ़-चढ़कर इसकी मदद करने में कोई कोताही नहीं बरती है। भारत के साथ इसके रिश्ते हमेशा ही बेहद करीबी और सांस्कृतिक व सामाजिक तौर पर काफी मजबूत रहे हैं। वहां की कुल तकरीबन साढ़े चार लाख की आबादी में 22,000 से अधिक की हिस्सेदारी भारतीय प्रवासियों की ही है। लेकिन भौगोलिक, सामाजिक व सांस्कृतिक तौर पर भारत के बेहद करीब होने के बावजूद हालिया दिनों तक मालदीव चीन की गोद में बैठा हुआ दिखाई दे रहा था। चीन ने उसे भरपूर सब्जबाग दिखाया हुआ था और वहां ढ़ांचागत विकास के नाम पर चीन ने पानी की तरह पैसा भी बहाया। मालदीव के साथ उसने मुक्त व्यापार समझौता कायम कर लिया और उसे पूरी तरह अपने शिकंजे में लिया। उस पर कर्ज का इतना बोझ डाल दिया कि मालदीव की स्थिति काफी हद तक चीन के उपनिवेश सरीखी हो गई। वह चाह कर भी किसी भी मामले में चीन का प्रतिरोध नहीं कर सकता था। दूसरी ओर चीन ने मालदीव को बीते दिनों 3.2 अरब डाॅलर का इनवायस थमा दिया। इस रकम का भुगतान करने के बाद ही मालदीव चीनी कर्ज के जाल से आजाद हो सकता है। लेकिन मसला है कि ना तो मालदीव की ऐसी हैसियत है कि वह इतना बड़ा कर्ज एक ही झटके में चुका सके और ना ही चीन अपने कर्ज की वसूली में रियायत बरत सकता है। ऐसे में तात्कालिक तौर पर तो मालदीव की नई सरकार ने चीन से दूरी बनाते हुए मुक्त व्यापार समझौते को रद्द कर दिया और दूसरी ओर उसने भारत से मदद की गुहार भी लगाई। वैसे भी हिन्द महासागर की परिधि में भारत ही इकलौता देश है जो ऐसे गाढ़े वक्त में मालदीव की मदद कर सकता है और मालदीव के प्रति प्रगाढ़ मित्रता और अपनेपन का मुजाहिरा करते हुए इस महीने की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मालदीव के राष्ट्रपति सोलिह के शपथ ग्रहण समारोह में भागीदारी करने वहां गए भी थे। इस मालदीव यात्रा के दौरान मोदी और सोलिह के बीच महत्वपूर्ण बैठक भी हुई जिसमें दोनों नेताओं ने दोनों देशों के बीच के निकटतम संबंधों को पुनर्जीवित करने की वचनबद्धता जताई और हिन्द महासागर क्षेत्र में शांति तथा स्थिरता बनाये रखने के लिये साझा हितों को सामने रखकर साथ मिलकर काम करने के लिये दोनों के बीच आपसी सहमति भी बनी। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने औपचारिक तौर पर यह ऐलान किया कि “पड़ोस पहले” की नीति के तहत भारत, मालदीव के सम-आर्थिक विकास में पूरी तरह से मदद करेगा और इसके जवाब में मालदीव के विदेश मंत्री ने भी बताया कि भारत की सुरक्षा तथा रणनीतिक चिंताओं के प्रति उनका देश पूरी तरह संवेदनशील है। दोनों देशों की विकास साझेदारी को सशक्त करने पर दोनों पक्षों ने विस्तार से चर्चाएं कीं तथा भारत ने इस द्वीप देश की विकास वरीयताओं में समर्थन देने और राजकोषीय तथा बजट स्थिरता सुनिश्चित करने को लेकर आश्वस्त किया। मित्रता का आलम यह रहा कि मालदीव के राष्ट्रपति ने सत्ता संभालने के बाद पहले विदेश दौरे के लिये भारत को ही चुना। बदले में भारत ने भी उन्हें निराश नहीं किया और परोक्ष तौर पर ऐसा इंतजाम कर दिया मालदीव बड़ी ही आसानी से चीनी कर्ज के जाल को चरणबद्ध तरीके से तोड़कर बाहर निकल सके। इसी क्रम में मालदीव के विदेश मंत्री की हालिया भारत यात्रा के दौरान सुषमा स्वराज के अलावा निर्मला सीतारमण ने उन्हें भरोसा दिलाया कि मालदीव की संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिये भारत पूरी तरह मदद करेगा। लेकिन भारत के साथ मालदीव की बढ़ती नजदीकी ने चीन की नींद उड़ा दी और उसने मालदीव की नवनिर्वाचित सरकार के खिलाफ पर्दे के पीछे से प्रोपेगेंडा फैलाना शुरू कर दिया ताकि विश्व बिरादरी यह समझे कि मालदीव की नई सरकार भारत के हाथों बिक गई है। प्रचारित किया गया कि भारत ने मालदीव को एक सौ करोड़ डाॅलर की आर्थिक मदद मुहैया कराने की पेशकश की है और बदले में मालदीव की सरकार ने अपनी जमीन पर भारत को सैन्य अड्डा बनाने की इजाजत देने का भरोसा दिया है। जाहिर है कि इस तरह की अफवाहों का ना तो कोई आधार था और ना ही ऐसी कोई नीति कभी भारत ने किसी देश के प्रति अपनाई है। बल्कि ऐसे काम करने के लिये ची नही कुख्यात है और वही गरीब देशों को अपने कर्ज के जाल में फांस कर उनकी जमीन का मनमाना इस्तेमाल करने के लिये पहचाना जाता है। ऐसा ही उसने श्रीलंका के साथ करने की कोशिश की और पाकिस्तान के साथ कर रहा है। लेकिन मालदीव की सरकार ने इस अफवाह का कड़ाई से प्रतिरोध करके बिल्कुल ही सही कदम उठाया है और उसने सिरे से इस बात का खंडन किया है कि उसे भारत ने ऐसी कोई पेशकश की ही नहीं है। साथ ही उसने यह कह कर भारत की चिंता को दूर करने का ही काम किया है कि वह अपनी जमीन से किसी अन्य मुल्क की सामरिक गतिविधियां हर्गिज संचालित नहीं होने देगा। यानि चीन ने जो बदमाशी करने की कोशिश की उसकी चोरी को मालदीव और भारत ने समय रहते पकड़ लिया है और उसकी पूरी योजना धराशायी हो गयी है। वैसे भी चीन को यह समझ लेना चाहिये कि भारत ने आज तक किसी भी देश की संप्रभुता से खिलवाड़ नहीं किया है और ना ही कभी ऐसा करने की सोच सकता है। रहा सवाल चीन की खुराफातों का तो निश्चित ही मालदीव को सावधान रहने की जरूरत है और उसे भारत की विदेश नीति के इतिहास पर भरोसा करना चाहिये जो पड़ोसियों की मजबूती में ही अपनी खुशी देखती है और इसकी गवाही भूटान भी देगा और नेपाल भी।