फिर संसद में संग्राम की तैयारी






विपक्ष की बैठक में सरकार को संसद से लेकर सड़क तक घेरने को लेकर जो आम सहमति बनी है और बीते दिनों पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के रूझानों से उसे जो ताकत मिली है उसके बाद संसद में शांति का माहौल कायम कर पाना इस बार सरकार के लिये भारी सिरदर्दी का सबब बनता हुआ स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है। यह इसलिये भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि बीते कुछ दिनों में सरकार ने भी अपने तेवरों से साफ कर दिया है कि विपक्ष को साम-दाम से समझाने के बजाय वह उसके खिलाफ दंड-भेद की नीति पर काम करना ही बेहतर समझ रही है। ऐसे में टकराव भी तय है और टकराव का मंच भी तैयार है।  ना तो सरकार किसी भी दबाव में झुकने के लिये तैयार है और ना ही विपक्ष अब सरकार को काम करने की छूट देने की मंशा रखता है। लिहाजा यह कहना गलत नहीं होगा कि सत्तापक्ष और विपक्ष के इस टकराव में संसद के शीतकालीन सत्र की बलि चढ़ने वाली है। वास्तव में देखा जाये तो आगामी लोकसभा चुनाव से पूर्व आयोजित हो रहे संसद के अंतिम पूर्ण सत्र यानि शीतकालीन सत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जोरदार संघर्ष की भूमिका तैयार हो गयी है। राॅबर्ट वाड्रा के कार्यालय में आयकर विभाग के छापे और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर भ्रष्टाचार का सीधा आरोप लगाते हुए भाजपा द्वारा उनके खाते में नेशनल स्टाॅक एक्सचेंज लिमिटेड घोटाले के मुख्य आरोपी जिग्नेश शाह द्वारा रकम डाले जाने की बात को तूल दिये जाने से अब इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया है कि सरकार भी संसद चलाने के एवज में विपक्ष पर हमला करने से बचने की राह पकड़ना उचित नहीं समझा है। ऐसे में जबकि सरकार सीधे तौर पर विपक्ष की दुखती रग को दबाने पर आमादा हो और विपक्ष भी संसद के अंतिम पूर्ण सत्र को पूरी ताकत व एकजुटता के साथ पूरी तरह भुनाने पर आमादा हो तब कैसे उम्मीद की जाए की संसद में शांति कायम रह पाएगी और कामकाज का माहौल बन पाएगा। हालांकि औपचारिक तौर पर कोई यह नहीं जताना चाहता कि उसकी मंशा संसद को बाधित करने या विरोधी को उकसाने की है। अलबत्ता जहां एक ओर सरकार की कोशिश होगी कि तीन तलाक और राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन बिल सरीखे विधेयकों को संसद से पारित कराया जाए वहीं विपक्ष ने राफेल विमान सौदे की संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराए जाने की मांग को आगे रख दिया है। इसके अलावा सरकार को घेरने के लिये विपक्ष की ओर से जिन मुद्दों पर हंगामा खड़ा किया जाएगा उनमें भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता, जांच एजेंसियों के दुरुपयोग, वोटर्स लिस्ट से छेड़छाड़, ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाने, महंगाई, और किसानों की समस्याएं की मुख्य रूप से शामिल हैं। हालांकि सदन को शांति पूर्वक संचालित करने की अपील करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्ष को यह आश्वासन अवश्य दिया है कि सरकार सभी मुद्दों पर चर्चा के लिये पूरी तरह तैयार है लेकिन विपक्ष ने भी साफ कर दिया है कि वह सिर्फ सामान्य चर्चा से कतई संतुष्ट नहीं होने वाला है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलामनबी आजाद ने बेलाग लहजे में कहा है कि राफेल के मसले पर जेपीसी की मांग को कतई नहीं छोड़ा जा सकता है। हालांकि विपक्ष को मनाने के लिये सरकार ने भी सर्वदलीय बैठक बुलाई है और लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन ने भी संसद सत्र के पहले दिन सर्वदलीय बैठक का आयोजन किया है। लेकिन सत्र के शुरूआत की पूर्व संध्या पर तमाम विपक्षी दलों ने भी मुद्दों पर आम राय कायम करने के मकसद से बैठक करके यह साफ कर दिया है कि इस बार शीत सत्र के दौरान सरकार को विपक्ष की बिखरी हुई ताकत के कारण मिलती आ रही सहूलियत मयस्सर नहीं हो पाएगी बल्कि उसे पूरे विपक्ष की एकजुट शक्ति का सामना करने के लिये तैयार रहना होगा। दरअसल संसद का शीतकालीन सत्र 11 दिसंबर से शुरू होकर 8 जनवरी तक चलने वाला है और इस दौरान संसद की कुल 20 बैठकें होंगी। इसमें सरकार के पास विधायी कामकाज की बहुतायत है और आम चुनाव से पहले का अंतिम पूर्ण सत्र होने के कारण सरकार की कोशिश होगी कि इस सत्र में अधिकांश महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करा लिया जाए। शीतकालीन सत्र के दौरान सरकार जिन विधेयकों को पारित कराने की कोशिश करेगी उनमें तीन तलाक और मेडिकल बिल के अलावा बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देने, मानव तस्करी रोकथाम, संरक्षण और पुनर्वास की व्यवस्था करने, ट्रांसजेंडरों के अधिकारों का संरक्षण करने और गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून में संशोधन करने का विधेयक मुख्य तौर पर शामिल है। इसके अलावा प्रवासी भारतीयों को पोस्टल एवं ई-बैलेट से वोटिंग का अधिकार देने वाले जिस विधेयक को लोकसभा से पहले ही पारित कराया जा चुका है उसे भी इस सत्र के दौरान राज्यसभा में लाया जा सकता है। साथ ही सरकार पर सहयोगियों व समर्थकों का भी पुरजोर दबाव है कि शीतसत्र के दौरान अयोध्या में विवादित जमीन पर भव्य राममंदिर बनाने की राह तैयार करने के लिये कानून बनाया जाए। इन तमाम विधेयकों को पारित कराने के लिये आवश्यक है कि संसद का सत्र सुचारू ढ़ंग से व शांतिपूर्वक संचालित हो जबकि विपक्ष के लिये भी संसद के मंच का इस्तेमाल करते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा करने का यह काफी हद तक अंतिम मौका है। वैसे भी आम चुनाव से पहले एक छोटा सा अंतरिम बजट सत्र ही आयोजित होगा जिसमें चर्चा और हंगामें की गुंजाइश बेहद कम रहेगी। लिहाजा विपक्ष इस अंतिम पूर्ण सत्र में अपनी पूरी ऊर्जा लगाने में कोई कोताही बरते के मूड में नहीं है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलामनबी आजाद ने स्पष्ट कर दिया है कि शीतकालीन सत्र में राफेल सौदे की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति के गठन की मांग और भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता तथा जांच एजेंसियों के दुरुपयोग सहित कई अन्य मुद्दे उठाए जाएंगे। हालांकि संसद में टकराव का माहौल बने लेकिन चर्चा और संवाद का क्रम जारी रहे तो ही देश का भला होगा वर्ना टकराव के कारण अगर सत्र का कामकाज बाधित हो और कोई बहस या चर्चा ही ना हो सके तो इसे दुखद ही कहा जाएगा।