व्यापक पशु-नीति की जरूरत






हमारा देश कृषि प्रधान भी है, धार्मिक व रूढ़िवादी भी और प्रकृति पूजक भी। यही वजह है कि हमारे सामाजिक ताने-बाने में पशुओं का अलग और विशेष स्थान है। खास तौर से हिन्दू मान्यताओं में जहां हर देवी-देवता का वाहन कोई ना कोई पशु हो वहां पशुओं के प्रति विशेष आदर व सम्मान की जीवंत धारा का होना स्वाभाविक ही है। उसमें भी गाय, बंदर और कुत्ते सरीखे पशुओं को हिन्दू मान्यताओं में विशेष आदर व सम्मान हासिल है। जहां एक ओर गाय में सभी देवी-देवताओं का अंश व प्रभाव होने की बात कही जाती है वहीं बंदर को भगवान हनुमान का जीवित प्रतीक माना जाता है। इसी प्रकार बैल को महादेव की सवारी का दर्जा हासिल है और कुत्ते को भैरव का प्रतीक माना जाता है। इन धार्मिक मान्यताओं से अलग हटकर भी देखें तो हालिया दिनों तक भारतीय सामाजिक व्यवस्था में गाय, बैल और कुत्ते को बेहद महत्वपूर्ण स्थान हासिल था और सिर्फ आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि आर्थिक तौर पर भी इन जीवों पर समाज की निर्भरता थी। बैल के बिना खेती की कल्पना नहीं की जा सकती थी और दूध, गोबर, खाद व चमड़े के लिये गाय की जरूरत थी। इसी प्रकार कुत्तों को सुरक्षा के लिये बेहद आवश्यक माना जाता था और बीते कुछ दशकों तक हर गांव-कस्बे में तस्वीर ऐसी ही थी कि किसी के भी दरवाजे पर कम से कम एक गाय, एक बैल और एक कुत्ते की मौजूदगी अनिवार्य थी। लेकिन वक्त बदला और खेती के लिये आधुनिक तकनीक का प्रयोग आरंभ हुआ तो इन पशुओं पर निर्भरता कम होती चली गई और अब स्थिति यह है कि गाय-बैल पालना घाटे का सौदा बन गया है। दूध के लिये भी संकर नस्ल की जर्सी गाएं पाली जाने लगी और दूध कम व गोबर अधिक देने वाली देसी गाय पालने से लोग कतराने लगे। इसी प्रकार रहने के लिये स्थान सिमटने और फ्लैट संस्कृति के बढ़ते चलन ने देसी कुत्तों को हाशिये पर पहुंचा दिया। नतीजन गाय जब तक दूध दे रही हो तब तक किसी प्रकार किसान उसे चारा-पानी दे भी देता है लेकिन दूध नहीं देने वाली और बूढ़ी व कमजोर गायों को किसान दरवाजे से हांकने लगे हैं। चुंकि गाय के साथ धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं लिहाजा उसको लेकर मानवीय संवेदनाएं बेहद प्रबल हैं लेकिन गायों के साथ जुड़ी समस्याओं की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। हालांकि चुनावी वायदों में गौशाला बनाने की बात अवश्य की जाती है लेकिन जमीनी स्तर पर देखें तो जहां पहले से गौशाला संचालित हो रही है वहां भी गायों की स्थिति बेहद ही दयनीय है। बैलों की हालत तो और भी बुरी है क्योंकि देसी नस्ल का बैल तो फिर भी गाड़ी खींचने या हल जोतने के काम आ जाता है लेकिन अधिक दूध के लिये पाली जा रही जर्सी गायों का बैल तो किसी काम का नहीं होता। लिहाजा कोई भी किसान उसे बैठे-ठाले दाना-चारा देने के लिये तैयार नहीं हो पाता। नतीजन अब गांवों की जो तस्वीर दिखाई पड़ रही है उसमें आवारा भटकते गाय-बैल समाज की सिरदर्दी का सबब बनते जा रहे हैं। दूसरी ओर गौरक्षा के नाम जारी आदोलनों का नतीजा यह हुआ है कि गौवंश की खरीद-बिक्री पर भी काफी हद तक अघोषित रोक लग गयी है। यहां तक कि मरी गाय को उठाने और उसका चमड़ा निकालने का साहस भी कोई नहीं कर पाता। इसी प्रकार गांव से लेकर शहरों व महानगरों तक में आवारा कुत्तों की लगातार बढ़ती तादाद ने लोगों का जीना दुश्वार किया हुआ है। बीते समय में जो कुत्ते लोगों की सुरक्षा की गारंटी हुआ करते थे वह अब सुरक्षा के लिये खतरा बन गए हैं। यही स्थिति बंदरों की है जिनका जंगल सिमटता जा रहा है और उनके लिये मानव बस्तियों के आस पास शरण लेने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। ये सभी अब समाज के लिये सिरदर्दी का सबब बन गए हैं और खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाने के अलावा ये लोगों पर हमले भी कर रहे हैं। लेकिन समस्या यह है कि धार्मिक मान्यताओं के कारण ना तो इनको मारा जा सकता है और ना ही इन्हें किसी भी तरह से नुकसान पहुंचाया जा सकता है। ऐसे में अब आवश्यकता है कि सरकार इस ओर ध्यान दे और पशुओं को लेकर एक समग्र व व्यापक नीति बनाए। निश्चित ही गायों व बैलों को बूचड़खाने में भेजे जाने या बंदरों व कुत्तों की हत्या किये जाने के विकल्प पर तो विचार भी नहीं किया जा सकता। लेकिन इनकी आबादी को नियंत्रित करने की दिशा में तो कदम उठाना ही होगा। अभी कई प्रदेशों में कुत्तों व बंदरों की नसबंदी का काम अवश्य चल रहा है लेकिन यह काम अधिकतर गैर सरकारी संस्थाओं से ठेके पर कराया जा रहा है। उन पर इस बात की कोई जवाबदेही नहीं है कि वे जिस इलाके में काम कर रहे हैं वहां इनकी आबादी पर विराम लग सके। बल्कि ये संस्थाएं जितना काम कर पाती हैं उतने को ही पूरा मान लिया जा रहा है। इसी प्रकार गायों व बैलों को सुरक्षित पनाहगाह उपलब्ध कराए जाने की जरूरत है जहां उनकी सुरक्षा भी हो सके और उन्हें दाना पानी की सहज उपलब्धता हो। ऐसा नहीं है कि यह सब करने से सरकार पर कोई बहुत बड़ा आर्थिक बोझ पड़ेगा बल्कि जरूरत है व्यवस्था को जवाबदेह बनाने की जिससे आमदनी की राह भी निकल सकती है। खास तौर से जिस तेजी के साथ आॅर्गेनिक खेती की ओर पूरा विश्व गंभीरता से आगे बढ़ रहा है और आयुर्वेद के वैश्विक प्रसार के कारण गौमूत्र की मांग बढ़ती जा रही है उसे देखते हुए पशुओं के पनाहगाहों से आर्थिक लाभ भी मिलना तय ही है। इसके अलावा हर गांव व पंचायत में गोचर की भूमि को अवेध कब्जे से मुक्त कराए जाने की जरूरत है ताकि पशुओं के लिये अलग से जमीन की भी जरूरत ना पड़े। साथ ही इनकी आबादी के प्रबंधन पर ध्यान देना आवश्यक है। इस सबके लिये आवश्यक है कि सरकार एक व्यापक पशु-नीति लेकर आए और उसे जमीनी तौर पर लागू करने की भी व्यवस्था की जाए। ताकि पशुओं से समाज को भी दिक्कत ना हो और समाज की जरूरतों को पूरा करने के लिये पशुओं की उपलब्धता भी बनी रहे।