अफगान मोर्चे पर असमंजस






भारत के साथ अफगानिस्तान के रिश्ते यूं तो सतही तौर पर काफी मजबूत हैं और अमेरिका के साथ मिल कर वहां विकास और आधारभूत अवसंरचना के क्षेत्र में लगातार काम भी किया जा रहा है। लेकिन इन दिनों जिस तेजी के साथ अमेरिका की अफगान नीति एकतरफा तरीके से आगे बढ़ रही है उसमें भारत के लिये चिंता बढ़ना स्वाभाविक ही है। दरअसल अमेरिका के लिये अफगानिस्तान की जरूरत तभी तक थी जब तक रूस के साथ उसका शीतयुद्ध चल रहा था। उस दौरान तो अमेरिका ने तालिबान के कांधे पर बंदूक रख कर रूस के खिलाफ तमाम हथकंडे अपनाए। लेकिन रूस के विघटन के बाद जब शीतयुद्ध का दौर समाप्त हो गया तब अमेरिका के लिये अफगानिस्तान की आवश्यकता भी कम होती चली गई। लेकिन अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिये उसने तालिबान की शक्ल में जिस हिंसक दानव का पालन-पोषण और संरक्षण किया उसके द्वारा अफगानिस्तान सहित समूचे विश्व में बरपाए जा रहे कहर की समस्या से निपटने के लिये अमेरिका को नहीं चाहते हुए भी अफगानिस्तान में डटे रहने पड़ा और तालिबान से सीधा मुकाबला भी करना पड़ा। लेकिन इस युद्ध में अमेरिका को हासिल कुछ भी नहीं हुआ अलबत्ता तालिबान की औकात अवश्य एक सीमित क्षेत्र में सिमट कर रह गई। लेकिन तालिबान और पाकिस्तान को एक साथ जोड़कर अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल करके रूस के खिलाफ रचे गए प्रपंच की समाप्ति के बाद भी तालिबान और पाकिस्तान की जुगलबंदी बदस्तूर जारी रही और अफगानिस्तान के बड़े हिस्से से खदेड़े जाने के बाद तालिबान ने पाकिस्तान की जमीन पर जाकर शरण ले ली। हालांकि अमेरिका ने पाकिस्तान को काफी चेतावनियां दीं कि वह तालिबान से अपना पल्ला झाड़े और उसे अफगानिस्तान की ओर खदेड़े। लेकिन जब पाकिस्तान ने अमेरिका की बात नहीं मानी तो अमेरिका को मजबूरन पाकिस्तान की जमीन पर छिपे तालिबानियों से निपटने के लिये पाकिस्तानी जमीन पर बमों की बारिश करनी पड़ी। लेकिन इस सबका हासिल भी कुछ खास नहीं रहा अलबत्ता पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों में दूरी अवश्य आ गई। लेकिन इस बीच भारत की भूमिका बेहद स्पष्ट रही कि उसने अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ जारी सैन्य अभियान में तो कभी हिस्सेदारी नहीं की लेकिन वहां के लोगों के हितों और विकास के लिये भारत लगातार अमेरिका के साथ कांधे से कांधा मिलाकर खड़ा रहा। कई मामलों में तो भारत ने अमेरिका की तुलना में काफी अधिक काम किया जिस पर तंज कसते हुए बीते दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अफगानिस्तान में भारत द्वारा बनाए गए कथित पुस्तकालय का मजाक भी उड़ाया था। लेकिन भारत की नीति हमेशा से अफगानिस्तान के प्रति मैत्री की ही रही और यह आवश्यक भी था क्योंकि पाकिस्तान से निपटने में अफगानिस्तान ही हमारा सबसे मजबूत साथी बन सकता है। हालांकि तालिबान का आज भी अफगानिस्तान के तकरीबन आधे भू-भाग पर कब्जा है लेकिन सत्ता पर उसकी पकड़ नहीं है। उसे अभी तक किसी भी देश ने स्वीकार करने की पहल भी नहीं की है और लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई अमेरिका व भारत समर्थित सरकार को ही जमीनी तौर पर भी मान्यता है और वैश्विक तौर पर भी। तालिबान की छवि आज भी आतंकी लड़ाका संगठन की ही जबकि उसका काफी बड़ा धड़ा लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उसके इस बदलाव को सार्थक दिशा देकर अब अमेरिका की कोशिश है कि यथाशीघ्र अफगानिस्तान से अपनी फौज वापस बुला ली जाए और वहां के हालातों में अपना हस्तक्षेप सीमित कर लिया जाए। इसके लिये उसने तालिबान और अफगानिस्तान सरकार को वार्ता के मंच पर लाने की पहल भी की है और इस दिशा में उसे अब सफलता भी मिलने लगी है। तालिबान के साथ अमेरिका ने बातचीत के लिये जलमय खलीलजाद को नियुक्त कर दिया है जिन्होंने तालिबान के साथ पांच दिवसीय वार्ता के बाद यह संकेत दिया था कि अफगानिस्तान में 17 वर्षों ने से जारी गृहयुद्ध अब शीघ्र ही समाप्त हो जाएगा। खलीलजाद को सीधे तौर पर यह जिम्मेवारी दी गई कि अफगान सरकार और तालिबान के बीच संधि कराके अमेरिकी फौज की रवानगी का रास्ता तैयार करें। लेकिन तालिबान ने एक ओर वार्ता प्रक्रिया में सहभागिता भी की है लेकिन दूसरी ओर अमेरिका द्वारा वापसी का रास्ता तलाशे जाने की स्थिति में अपनी पैठ मजबूत करनी भी शुरू कर दी है। तभी तो पेंटागन की रिपोर्ट यह बता रही है कि बीते कुछ दिनों तक जिस तालिबान के पैर उखड़े हुए थे उसने अफगानिस्तान के आधे भू-भाग पर फिर से कब्जा कर लिया है। ऐसे में यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि अमेरिकी फौज के वापस लौटते ही तालिबान फिर से अफगानिस्तान पर अधिकार कर लेगा और पाकिस्तान के साथ उसकी मिलीभगत को देखते हुए भारत के लिये वहां विकास के काम को जारी रखना और अपने अब तक के निवेश को सुरक्षित रख पाना नामुमकिन हो जाएगा। लेकिन इस खतरे के प्रति भारत की ओर से कोई भी कदम नहीं उठाया जाना वाकई बेहद चिंताजनक है। कायदे से तो भारत को तालिबान के प्रति अमेरिका की नरमपंथी नीति का खुल कर विरोध करना चाहिये था लेकिन ऐसा नहीं किया गया। अब भी केवल भारत की ओर से तालिबान का बहिष्कार ही किया जा रहा है जबकि इस सांकेतिक बहिष्कार से कुछ भी हासिल नहीं होनेवाला है। सच तो यह है कि भारत को इस मामले में अब सक्रिय भूमिका निभाने के लिये तैयार होना पड़ेगा और इस मसले को संयुक्त राष्ट्र में उठाकर अमेरिका पर यह दबाव बनाना होगा कि वह मौजूदा परिस्थितियों में अफगानिस्तान को अधर में लटका हुआ छोड़कर वहां से ना निकले। इसके लिये बेशक भारत वहां अपनी सैन्य तैनाती ना करे लेकिन अफगानिस्तान की अन्य तरीकों से मदद करने की दिशा में कदम बढ़ाए ताकि अमेरिकी फौज की वापसी के बाद अफगानिस्तान पर कब्जा करने की तालिबान की कोशिशों को समय से पहले ही ध्वस्त किया जा सके। जब तक तालिबान के कब्जे से अफगानिस्तान को पूरी तरह आजादी नहीं मिल जाती और अफगानिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां अपने जमीन की हिफाजत करने में सक्षम नहीं हो जातीं तब तक भारत को उसे सीमित सामरिक सहयोग मुहैया कराने से भी परहेज नहीं बरतना चाहिये। हालांकि हालात अभी काबू से बाहर नहीं हुए हैं लेकिन अमेरिकी नीतियों के अनुसार अगर भारत ने अपनी भूमिका तय करने में देर की तो निश्चित ही इसका नुकसान हमें भी उठाना ही पड़ेगा।