आईसीयू में स्वास्थ्य व्यवस्था






इससे बड़ी विडंबना की बात और क्या हो सकती है कि एक ओर भारत को दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनाने का प्रयास किया जा रहा है और दूसरी ओर खुशहाली के आंकड़ों में देश साल दर साल लगातार पिछड़ता जा रहा है। हमसे अधिक खुशहाल तो हमारे छोटे पड़ोसी हैं जिनको पास आर्थिक संसाधन बेशक कम हों या उनके विकास की गति कमजोर ही क्यों ना हो लेकिन अपने नागरिकों को संतुष्ट रखने के मामले में वे हमसे कहीं आगे हैं। हमने हर गरीब को बैंक खाता तो दे दिया लेकिन उसके इस बात की चिंता नहीं कि उसका घर अनाज से खाली ना रहे। दो वक्त का पूरा पोषण हर किसी को मिले इसे हमने अपनी प्राथमिकताओं में ना पहले कभी रखा और ना ही आज इसकी परवाह कर रहे हैं। वर्ना राष्ट्रपति के अभिभाषण में 2022 की जो तस्वीर दिखाई गई उसमें यह जिक्र जरूर होता कि उस साल के बाद देश में कोई खाली पेट नहीं रहेगा। यही दुर्दशा स्वास्थ्य की है। आम आदमी के लिये श्मशान और कब्रिस्तान में तो जगह है लेकिन अस्पताल में नहीं। यहां आम आदमी के साथ वैसा ही सलूक होता है जैसे भोज या भंडारे वाली जगह पर कुत्ते के साथ। उसे दुत्कार तो मिलती है मगर उपचार नहीं मिलता। तब तक जब तक कि किसी रसूखदार की सिफारिश ना हो। आलम यह है कि लोग मरते हैं तो मरें, चीखें, चिल्लाहें या कराहें। किसी की कोई जवाबदेही नहीं, किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं। तभी तो कोई सड़क पर प्रसव के लिए मजबूर है तो कोई इलाज के अभाव में दम तोडने के लिए। अस्पतालों की दुर्दशा का अलम यह है कि कहीं सुविधाएं नदारद हैं तो कहीं चिकित्सक। जहां ये दोनों है वहां कोई जवाबदेही नहीं है। मरीज से ऐसे मिलते हैं जैसे एहसान कर रहे हों। मजाल है कि किसी मरीज को दो मिनट से अधिक का वक्त दे दें। नेशनल हेल्थ प्रोफाइल (2018) के अनुसार भारत में औसतन 11,000 लोगों की आबादी के लिए एक एलोपैथिक सरकारी डॉक्टर मौजूद है। उस पर भी भारत में डॉक्टर औसतन महज दो मिनट ही अपने मरीजों को देखते हैं। इस बात की पुष्टि ब्रिटेन की चिकित्सा पर आधारित पत्रिका 'बीएमजे ओपन' में की गई है जिसमें कहा गया है कि भारत में प्राथमिक चिकित्सा परामर्श का समय 2015 में दो मिनट था। ऐसे में अगर कोई महामारी या संक्रमण की स्थिति हो हालात कितने बदतर हो सकते हैं इसकी बानगी दिख रही है बिहार में जहां चमकी बुखार यानि एक्यूट इन्सैफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से मरने वाले बच्चों की संख्या के बारे में दावे से कोई कुछ नहीं कह सकता। सूबे के एक दर्जन से भी ज्यादा जिलों को अपनी चपेट में ले चुकी इस बीमारी की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अकेले मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कालेज अस्पताल में अब तक इस बीमारी से तकरीबन डेढ सौ से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है और लगभग पांच सौ बच्चे अस्पताल में जीवन और मौत की जंग लड रहे हैं। इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पूरे प्रदेश में पीडित और मृतक की तादाद कितनी होगी। ऐसा ही मामला बिहार के कई जिलों में जानलेवा बन चुके लू का भी है। मगर कौन सुने फरियाद जबकि किसी की प्राथमिकता में ही नहीं है पढ़ाई और दवाई का वह क्षेत्र जहां लूट नहीं हो रही, बकायदा डाका डाला जा रहा है, वह भी दिनदहाडे। पूरी दुनिया के मुल्कों में औसतन छह फीसदी जीडीपी का हिस्सा बुनियादी स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने और संचालित करने में खर्च किया जाता है जबकि हमारे देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल 1 प्रतिशत हिस्सा ही स्वास्थ्य में लगता है। नतीजा यह है कि औसतन 11,000 की आबादी पर सिर्फ एक डॉक्टर उपलब्ध है और दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के बोर में कहना की क्या। बिहार जैसे राज्य में स्थिति सबसे खराब है जहां एक डॉक्टर 28,391 लोगों की आबादी की सेवा करता है। बिहार के बाद दूसरे नंबर पर सबसे खराब स्थिति उत्तर प्रदेश की है जहां प्रति डॉक्टर 19,962 मरीज हैं। वहीं देश की राजधानी दिल्ली में 2203 मरीजों पर एक डॉक्टर उपलब्ध है। सच पूछा जाए तो टीबी, मलेरिया, डेंगू, मधुमेह और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के साथ देश लंबे समय से संघर्ष कर रहा है लेकिन इसके बावजूद सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र की उपेक्षा की। इस क्षेत्र में कोई खास ध्यान नहीं दिया गया। ना पहले की सरकारें ने इसे प्राथमिकता में रखा और ना ही मौजूदा सरकार ने इस स्थिति में बदलाव का कोई ठोस प्रयास किया। चिंता की एक और वजह अस्पतालों की अपर्याप्त संख्या भी है। देश में कुल 23,582 अस्पताल जिनमें 7,10,761 बेड हैं। 1.3 अरब आबादी वाले देश के लिए यह किस कदर नाकाफी है इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि हमारे देश में औसतन सरकारी अस्पताल का एक बिस्तर 1,908 लोगों के लिए है, जबकि यह स्थिति बिहार में सबसे खराब है जहां 8,789 मरीजों के लिए एक बेड है। झारखंड में 6,502 मरीजों पर एक बेड है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में बताया गया है देश की आबादी का कुल 3.9 प्रतिशत यानि 5.1 करोड़ भारतीय अपने घरेलू बजट का एक चैथाई से ज्यादा खर्च इलाज पर ही कर देते हैं, जबकि श्रीलंका में ऐसी आबादी महज 0.1 प्रतिशत है, ब्रिटेन में 0.5 फीसदी, अमेरिका में 0.8 फीसदी और चीन में 4.8 फीसदी लोग ऐसे हैं जिनकी घरेलू बजट का एक चैथाई से ज्यादा खर्च इलाज पर होता हो। आजादी के बाद से ही देश में रोटी, कपड़ा और मकान इंसान की बुनियादी जरूरतें बताई गई लेकिन कभी स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी जरूरत पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। नतीजन हालात इस कदर बेकाबू हो चुके हैं कि आम लोगों को समुचित स्वास्थ्य सेवाएं मिल ही नहीं पा रही हैं। उसका विकल्प आयुष्मान कार्ड कतई नहीं हो सकता क्योकि इससे बीमा व निजी क्षेत्र को तो सरकारी धन के दोहन का रास्ता मिल जाएगा लेकिन आम आदमी को इससे कुछ हासिल नहीं होगा। जरूरत है अस्पतालों की, दवाओं की, पर्याप्त डाॅकटरों की, ना कि पांच लाख तक के मुफ्त इलाज के दिखावे की।