नकली बीज बेचने वालों पर अब कसेगी नकेल

(डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा)


किसानों को नकली बीज बेचने वालों पर सरकार अब नकेल कसने की तैयारी में लगती है। दरअसल नकली बीज के कारण देश भर में हजारों किसानों की मेहनत पर पानी फिर जाता है। किसान की सारी मेहनत बेकार चली जाती है वहीं देश में कृषि उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सरकार द्वारा इसी सत्र में संसद में लाए जाने वाले प्रस्तावित मसौदे पर सुझाव चाहे जा रहे हैं। प्रस्तावित मसौदे में नकली बीज बेचने वालों को एक साल की सजा या पांच लाख रुपए तक के जुर्माने की सजा का प्रावधान किया जा रहा है। सरकार के 2022 तक किसानों की आय को दोगुणा करने के लक्ष्य को अर्जित करने की दिशा में इसे महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। देखा जाए तो आज किसान सभी राजनीतिक दलों के केन्द्र में है। ऋण माफी और इसी तरह के कार्यक्रम किसानों को लेकर बनाए जा रहे हैं। अब इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि एक और आर्थिक विकास की दर बढ़ानी है तो देश में कृषि उत्पादन बढ़ाना होगा, कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता का क्षेत्र बनाना होगा, कृषि क्षेत्र में प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा देना होगा और इन सबके साथ ही देश में कृषि क्षेत्र में देशी विदेशी निवेश बढ़ाकर किसानों के लिए खेती को आसान बनाना होगा। इसके साथ ही अब यह भी सबके समझ में आ गई है कि ऋण माफी जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सत्ता की सीढ़ी आसानी से चढ़ी जा सकती है। ऐसे में आने वाले समय में ऋण माफी का कोई दूसरा विकल्प भी खोजना होगा।
 आर्थिक मंदी के दौर में एक और जहां आर्थिक विकास की दर के लगातार गिरने के आंकड़े आ रहे हैं, बेरोजगारी बढ़ने के आंकड़े सामने है ऐसे में सरकार के सामने केवल और केवल मात्र दो ही विकल्प रह जाते हैं उनमें से पहला विकल्प जहां खेती किसानी की और खास ध्यान देते हुए उत्पादन बढ़ाने और किसानों की आय बढ़ाने की और ध्यान दिया जाना जरुरी हो गया हैं वहीं दूसरी और एमएसएमई उद्योगों को बढ़ावा देने की जरुरत है। अब इस बात को सरकार और आर्थिक विश्लेषक समझ चुके हैं कि हमारे देश की अर्थ व्यवस्था में तेजी खेती के क्षेत्र में विकास दर बढ़ाने से ही संभव है। आजादी के बाद कृषि उत्पादन बढाने के तो लाख प्रयास हुए हैं पर केवल उत्पादन बढ़ाने के अंधाधुंध प्रयोगों का खामियाजा आज देश को भुगतना पड़ रहा है। हो यह रहा है कि अत्यधिक जल दोहन से भूजल रसातल में जाता जा रहा हैं वहीं रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग और जहरीली कीटनाशकों के अंधाधूंध प्रयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित सामने हैं। अत्यधिक दुष्प्रभावी तत्वों के खेती में उपयोग से लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा विपरीत प्रभाव सामने हैं। आज सरकार किसानों को वापिस परंपरागत यानी कि ओरगनिक खेती की और ले जाने में लगी है। एक समय था जब खेती और पशुपालन साथ साथ चलता था। पशुपालन से कई फायदें एक साथ खेती को मिलते थे। पशुओं के खेत में चरने के साथ ही किसानों को बिना पैसा ही प्राकृतिक और अधिक उर्वराशक्ति वाला खाद मिल जाता था। घर में दूध दही घी मिलता था वह अलग। हांलाकि अब सरकार पशुपालन को बढ़ावा दे रही है। यह भी समझ से परे की बात है कि गोबर गैस जैसी योजनाएं क्यों नहीं सिरे से चढ़ पाई। मजे की बात यह है कि कृषि हमारी प्राचीन अर्थव्यवस्था की आधार रही है और कृषि और पशुपालन एक कंपोजिट खेती की व्यवस्था थी जिससे खेती में सहायता और घर में अतिरिक्त आय व साधन दोनों मिल जाते थे। यही कारण रहा कि ग्रामीण व्यवस्था अधिक सशक्त रही। 
 दरअसल खेती जिस तरह से आसान हुई है उसके साइड इफेक्ट भी सामने आने लगे हैं। जिस तरह से अब खेतों में फसल की कटाई हो रही है उससे कटाई के बाद बड़े डंटल रह जाते हैं और पराली के रुप में बड़ी समस्या हमारे सामने आ गई है। हांलाकि सरकार अब पराली के वैकल्पिक उपाय खासतौर से उससे खाद या बिजली उत्पादन में जुट रही हैं हांलाकि इसके सिरे से चढ़ने में अभी समय लगेगा। इसी तरह से उत्पादन बढ़ाने के नाम पर रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से सरकार व किसान दोनों के सामने समस्या उत्पन्न हो गई है। पंजाब के किसान आज पंजाब के गेहूं या धान का उपयोग स्वयं करने से कतराने लगे हैं। हांलाकि अब जिस तरह से ओरगनिक खेती को बढ़ावा देने का अभियान चलाया जा रहा है निश्चित रुप से इससे आने वाला समय किसानों का अपना होगा। कृषि विज्ञानियों को भी नए शोध में उत्पादकता के साथ गुणवत्ता की और ध्यान देना होगा। क्योंकि पर्यावरण की समस्या से आज सारी दुनिया जूझ रही है। कृषि उपकरण भी इस तरह के इजाद करने होंगे जिससे खेती और खेत पर प्रतिकूल असर नहीं पड़े। दरअसल हमारे देश में खेती का पैटर्न भी थोड़ा अजीब होता जा रहा है जिस साल जिस जिंस के भाव बढ़ते हैं दूसरे साल उसकी जमकर बुवाई होती है और मण्डी में आने पर भाव गिरे हुए होते हैं और स्थिति तो यहां तक आ जाती है कि लागत भी निकलना मुश्किल हो जाता है। किसानों की आत्महत्या को इसी से देखा जा सकता है। हांलाकि किसानों की आत्महत्या पर अब राजनीति अधिक होने लगी है। 
 नकली बीजों पर अंकुश लगाने का प्रयास इस मायने में महत्वपूर्ण हो जाता है कि किसान की सारी मेहनत बीजों पर निर्भर होती है। जब बीज वपन का मौका आता है या जब फल आने का मौका आता है तब आशानुकूल परिणाम नहीं मिलने से किसान ठगा सा रह जाता है। ऐसे में अन्नदाता की मेहनत पर पानी फेरने वालों को सख्त से सख्त सजा का प्रावधान किया ही जाना चाहिए। अन्नदाता को उसकी मेहनत का पूरा लाभ मिले और खेती किसानी लाभ का सौदा होने के साथ ही आज की नई पीढ़ी के खेती से हो रहे मोहभंग को रोका जा सके। नकली बीज ही नहीं नकली कृषि आदान बेचने वालों पर नकेल कसनी ही होगी वहीं इन नियमों कानून कायदों को सख्ती से लागू भी करना होगा।
डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा